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भगत सिंह से आख़री मुलाकात…
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भगत सिंह से आख़री मुलाकात…

रात के दो बजे मैं आँखें मूंदे सोच रहा था, भगत सिंह का दिन आ रहा है। विचार की चिड़िया ने अभी पंख खोले ही थी कि मैंने विचारों की दुनिया के अंदर धुएँ के बादलों में से एक परछाई को निकलते देखा। इस आत्मा के माथे पर चिंता की लकीरें साफ झलक रही थीं। इससे पहले कि मैं कुछ पूछ पाता, उसने मुझे कुछ लिखने के लिए इशारा किया और मेरी कलम कागज़ पर जम गई, उसने लिखवाया- चित्रांकन: गुरप्रीत सिंह, आर्टिटिस्ट, बठिंडा सबसे पहले मैं अपने देश के नेताओं, राजनीतिक दलों, संगठनों और गणमान्य व्यक्तियों से अनुरोध करना चाहूंगा कि इस बार चौक में मेरी और मेरे साथियों की मूर्तियों के गले में मालाओं के ढेर न पहनाएं जाएं, क्योंकि आज-कल देश की फिज़ा में ही बहुत घुटन महसूस कर रहा हूं। फूल-मालाओं का पहाड़ खड़ा करके आप हमारे लिए सांस लेना भी मुश्किल कर देते हैं। वैसे भी आप 23 मार्च या 28 सितंबर को फिर से आकर ही दोबारा हमा...
Film Review – Laal Singh Chadha – Hindi
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Film Review – Laal Singh Chadha – Hindi

लाल सिंह चड्ढा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इस किरदार को बनाने में काफी मेहनत की गई है। आमिर ख़ान ने न केवल एक सिख की भूमिका निभाई है, बल्कि पहली बार सिख चरित्र को पर्दे खालिस और वास्तविकता के करीब दिखाया गया है। इसके लिए आमिर ख़ान बधाई के पात्र हैं। दूसरी ख़ूबसूरत बात यह है कि इस सिख चरित्र के माध्यम से सिख धर्म के मूल सिद्धांत ‘सरबत दा भला’ को दिखाया गया है। इस सिद्धांत के तहत सिख किसी में भेदभाव किए बिना सबसे के साथ एक सा बर्ताव करते हैं। फिर सामने चाहे दुश्मन ही क्यों ना हो। यही उन्हें गुरूओं ने सिखाया है। ऐसे ही एक सिख भाई घनईया जी को गुरु गोबिंद सिंह की आशीष प्राप्त थी, जो जंग में सभी को पानी पिलाया करता था। मरहम-पट्टी करता था, बिना यह देखे कि वह किस फौज का सिपाही है। लाल सिंह चड्ढा का किरदार उन्हीं भाई घनाईया जी से प्रेरित हैं। लाल सिंह चड्ढा के किरदार की एक ख़ासियत यह भी ह...
बीयर चाचा चले गए #ATrueStory
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बीयर चाचा चले गए #ATrueStory

वह मुहल्ले के सबसे हेंडसम जेंटलमैन थे। सादे लेकिन बेहतरीन ढंग से कपड़े पहनने में उनका काेई सानी नहीं था। कई पगड़ी बांधने वाले लड़के उनके पगड़ी के पेचाें, जिन में एक भी बल नहीं हाेता था, से जलते थे और उन जैसी पगड़ी बांधना सीखने के बहाने ढूंढते रहते थे। अकसर अल सुबह, चमकता हुआ सफ़ैद पयजामा और आधी बाजू वाली बनियान पहने, वह हमारे घर के सामने वाली कपड़े इस्त्री की दुकान पर खड़े हाेते। जब वह हमें वहां खड़े अख़बार पढ़ते, गप्पे हांकते और बेलाैस हंसते हुए नज़र आते, ताे असल में उनकी तिरछी नज़र कपड़े इस्त्री करने वाले पर लगी रहती और इस्त्री वाला तब तक लगा रहता जब तक आख़री बल ना निकाल दे। इसी लिए वह वहीं खड़े रह कर कपड़े प्रैस करवाते थे। स्कूल जाते वक्त हम उन्हें अच्छी सी फिटिंग वाली पतलून, अंदर खाेंसी हुई कमीज़, मैचिंग पगड़ी और कस के बंधी हुई दाढ़ी और चमकते हुए काली पॉलिश वाले जूते पहने बज...
बेरोज़गारी का सबसे बड़ा सच, रोज़गार घटे, लोग हुएबेहाल
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बेरोज़गारी का सबसे बड़ा सच, रोज़गार घटे, लोग हुएबेहाल

2019 के लोक सभा चुनाव (Lok Sabha Election 2019) जैसे-जैसे अपने चर्म पर पहुंच रहा है, चुनाव प्रचार भी तीखा होता जा रहा है।      गौरतलब है कि बेरोज़गारी में रिकार्ड तोड़ बढ़ौतरी के बारे में एनएसएसओ (NSSO) द्वारा तैयार की गई सर्वे रिपोर्ट 19 दिसंबर 2018 को जारी होने वाली थी, जिसे सरकार ने छापने से रोक दिया, इसी दौरान यह रिपोर्ट लीक हो गई, जिस के बाद नीति आयोग (NITI Ayog) के वाईस चेयरमैन राजीव कुमार ने कहा कि सरकार की मंज़ूरी के बाद ही मार्च 2019 में रिपोर्ट जारी की जाएगी। मार्च क्या अब तो मई भी आधा गुज़र गया है रिपोर्ट जारी नहीं हुई और अगर दोबारा सरकार आती भी है तो इस रिपोर्ट के जारी होने की कोई संभावना नहीं है।   6 मार्च 2019 को रायटर्ज़ के हवाले से टैलीग्राफ़ में छपी ख़बर में सेंटर फॉर मोनीटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई, CMIE) की रिपोट प्रकाशित की गई। इस रिपोर्ट के मुताबिक फरवरी 2019 ...
अरुंधतिरॉय का उपन्यास ‘अपार खुशी का घराना’और ‘बेपनाह शादमानी की ममलिकत’ का लोकार्पण
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अरुंधतिरॉय का उपन्यास ‘अपार खुशी का घराना’और ‘बेपनाह शादमानी की ममलिकत’ का लोकार्पण

नई दिल्ली:  विश्वप्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय के अंग्रेजी में बहुचर्चित उपन्यास ‘द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ का हिंदी अनुवाद ‘अपार खुशी का घराना’ एवं उर्दू अनुवाद ‘बेपनाह शादमानी की ममलिकत’का लोकार्पण शनिवार को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुआ। इस उपन्यास का हिंदी में अनुवाद वरिष्ठ कवि और आलोचक मंगलेश डबराल और उर्दू अनुवाद अर्जुमंद आरा द्वारा किया गया, उपन्यास को दोनों भाषाओँ में राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है।लोकार्पण के बाद लेखिका अरुंधति रॉय, हिंदी अनुवादक मंगलेश डबराल और उर्दू अनुवादक अर्जुमंद आरा से वरिष्ठ लेखक संजीव कुमार एवं आशुतोष कुमार ने बातचीत की।कार्यक्रम की शुरूआत दास्तानगो दारेन शाहिदी द्वारा पुस्तक से मधुर अंशपाठ कर किया गया।इस मौके पर लेखिका अरुंधति रॉय ने कहा “ मेरी यह पुस्तक अब तक देश –विदेश के 49 भाषाओँ में अनुवाद हो चुकी है और अब हिंदी और उर्दू में ...
उनकी नीयत बनाम जियो की नीयति
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उनकी नीयत बनाम जियो की नीयति

जियो इंस्टीच्यूट के पैदा होने से पहले ही उसे ‘इंस्टीच्यूट ऑफ एमिनेंस’ का तमगा देने पर बवाल मचा हुआ है, जियो इंस्टीच्यूट की नियति क्या होगी यह तो भविष्य तय करेगा, लेकिन इस फ़ैसले ने सरकार की देश की शिक्षा नीति और देश के नौजवानों के भविष्य को लेकर नीयत एक बार फिर साफ़ कर दी है। एक तरफ़ सरकार ने जहां 17 दिग्गज़ों की कमेटी बना कर उन्हें भारत के इतिहास का भगवाकरण करने के काम पर लगाया हुआ है तो दूसरी तरफ़ तेज़ी से समूचा शिक्षा ढांचा और नीति कॉरपोरेट और निजी फ़ायदे के अनुरूप ढाली जा रही है। ऐसे में जियो इंस्टीच्यूट के नामो निशान तक ना होने के बावजूद उसे उत्कषर्टता का अस्थायी दर्जा देना भी हैरान करने वाली बात नहीं है। बल्कि इस कदम से सरकार ने तो खुले तौर पर ऐलान कर दिया उसकी शिक्षा नीति की दिशा और दशा क्या होगी और उसे किससे हित सर्वोपरि हैं। क्या है भला क्या है इंस्टीच्यूट ऑफ एमिनेंस है? जाननें के लिए क्...
जियो का बवालः भला क्या है इंस्टीच्यूट ऑफ एमिनेंस है?
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जियो का बवालः भला क्या है इंस्टीच्यूट ऑफ एमिनेंस है?

देश के शिक्षण संस्थानों को दुनिया के टॉप 100 की सूची में लाने के लिए केंद्र सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय ने एक योजना बनाई है, जिसके तहत देश के 20 शिक्षण संस्थानों को इंस्टीच्यूट ऑफ एमिनेंस का दर्जा दिया जा रहा है। इसके लिए यूजीसी द्वारा बनाई गई एम्पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी (ईईसी) ने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों से आवेदन मांगे गए थे। उत्कर्षट संस्थान का दर्जा पाने के लिए देश के कुल 114 संस्थान दौड़ में शामिल हुए, जिन में 11 सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़, 27 राष्ट्रीय महत्व के उच्च शिक्षण संस्थान, आईआईटीज़ एवं एनआईआईटीज़ आदि, 27 राज्य यूनिवसिर्टीज़ और 10 प्राईवेट यूनिवसिर्टीज़ शामिल हुईं। प्राईवेट इंस्टीच्यूट्स में ऐयरटेल की भारती यूनिवर्सिटी (सत्या भारती फाउंडेशन), दिल्ली, अनिल अग्रवाल की वेदांता यूनिवर्सिटी, ओडिशा, करिया यूनिवर्सिटी, इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस हैदराबाद, इंडस टेक यूनिवर्सिटी दिल्ली, अचार्य इंस्टीच...
तेरी जाति क्या?
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तेरी जाति क्या?

नाटक की भला कोई जाति होती है क्या? लेकिन नाटक जाति के सवाल पर बहुत गंभीर विमर्श कर सकता है। ख़ास कर उस शहर में जहां पर नाटक भी अछूत माना जाता है।असल में नाटक बड़ा दमदार माध्यम है। अगर इसे जी-जान से किया जाए तो दर्शकों को अंदर तक हिला देने की कुव्वत रखता है। पंजाब में नाटकों की विभिन्न किस्म की परंपराएं रही हैं। पूरी सीरिज़ में देखता हूं तो लुधियाना शहर नाटक के बड़े केंद्र के रूप में उभरता हुआ नज़र आता है। दशक भर पहले अमृतसर में निजी प्रयास से सम्पूर्ण आॅटोमेटेड रंगमंच का आगमन हुआ। वहां अब वीकऐंड रंगमंच का चलन आम हो गया है। लोग टिकट ख़रीद कर नाटक देखने आते हैं। दिल्ली, मुंबई जैसी फीलिंग आती है।दूसरी तरफ़ लुधियाना जैसे इंडस्ट्रियल शहर का नाटक अभी भी दानियों के रहमो-कर्म और रंगमंच संस्थानों के निजी प्रयासों तक सीमित है। पंजाबी साहित्य अकाडमी का ओपन ऐयर थिएटर हौसला बढ़ाता है। लेकिन पपड़ी बन कर धीरे-...
Film Review | Mom | फ़िल्म | समीक्षा मॉम
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Film Review | Mom | फ़िल्म | समीक्षा मॉम

-दीप जगदीप सिंह-रेटिंग 3/5 कथा - रवि उदयावर गिरीश कोहली कोना वेंकेट राओपटकथा एवं संवाद - गिरीश कोहली निर्देशक - रवि उदयावरमॉम मैम से मां बनने की कहानी है। यह एक मां की कहानी है, जिसे उम्मीद है कि उसकी बेटी एक दिन उसे मैम नहीं मां कहेगी। यह एक बेटी की भी कहानी है जो सोचती है कि 'मां की ज़िंदगी में बेटी आती है ना कि बेटी की ज़िंदगी में मां आती है।' मॉम एक बार फ़िर यह भी प्रमाणित करती है कि पालने-पोसने वाली मां भी जन्म देने वाली मां जितनी ही ममतामयी हो सकती है। इसके अलावा मॉम कानून और न्याय व्यवस्था के चरमरा कर ध्वस्त हो चुके उस दौर की भी कहानी है, जो अराजकता पनपने के लिए उर्वर भूमि प्रदान करने का माहौल पैदा करता है। बॉयलॉजी टीचर देविका (श्रीदेवी) पढ़ाई और अनुशासन के मामले में सख़्त भी है और पढ़ाई को रोमांचक बनाने जितनी आधुनिक भी। दुनिया की नज़र में वह अपने बिजनेसमैन पति आनंद (अदनान सद्दीकी),...
Movie Review | Padman | पैडमैन
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Movie Review | Padman | पैडमैन

दीप जगदीप सिंह | रेटिंग 2.5/5फ़िल्म देखने जाते समय मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि फ़िल्म लेखन के मामले में एक अच्छी पटकथा की उदाहरण हो सकती है। मुझे लगा था कि टाॅयलेट एक प्रेम कथा की तरह ही पैडमैन भी दो घंटे का एक सरकारी विज्ञापन होगी,   लेकिन इस बार फ़िल्म के लेखन ने मुझे प्रभावित किया है और जो लोग फ़िल्म लेखन में रूचि रखते हैं, उन्हें यह समीक्षा अंत तक पढ़नी चाहिए, उन्हें इसमें बेहतर सक्रीन राइटिंग के काफ़ी मंत्र मिलेंगे। चाहे यह एक परफ़ेक्ट फ़िल्म नहीं है लेकिन कहानी के ग्राफ़ और किरदारों के ग्राफ़ के मामले में इस फ़िल्म में काफ़ी कुछ सीखने वाला है।फ़िल्म में अक्षय कुमार बने है लक्ष्मीकांत चौहान उर्फ़ पैडमैन, उनकी पत्नी गायत्री के रोल में है राधिका आप्टे और प्रेमिका और प्रमोटर के रूप में हैं, सोनम कपूर। फ़िल्म का संकल्प है टविंकल खन्ना का और फ़िल्म लिखी है आ बाल्की और सवानंद किरकिरे ने, निर...