Sunday, August 7

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Movie Review | Padman | पैडमैन
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Movie Review | Padman | पैडमैन

दीप जगदीप सिंह | रेटिंग 2.5/5फ़िल्म देखने जाते समय मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि फ़िल्म लेखन के मामले में एक अच्छी पटकथा की उदाहरण हो सकती है। मुझे लगा था कि टाॅयलेट एक प्रेम कथा की तरह ही पैडमैन भी दो घंटे का एक सरकारी विज्ञापन होगी,   लेकिन इस बार फ़िल्म के लेखन ने मुझे प्रभावित किया है और जो लोग फ़िल्म लेखन में रूचि रखते हैं, उन्हें यह समीक्षा अंत तक पढ़नी चाहिए, उन्हें इसमें बेहतर सक्रीन राइटिंग के काफ़ी मंत्र मिलेंगे। चाहे यह एक परफ़ेक्ट फ़िल्म नहीं है लेकिन कहानी के ग्राफ़ और किरदारों के ग्राफ़ के मामले में इस फ़िल्म में काफ़ी कुछ सीखने वाला है।फ़िल्म में अक्षय कुमार बने है लक्ष्मीकांत चौहान उर्फ़ पैडमैन, उनकी पत्नी गायत्री के रोल में है राधिका आप्टे और प्रेमिका और प्रमोटर के रूप में हैं, सोनम कपूर। फ़िल्म का संकल्प है टविंकल खन्ना का और फ़िल्म लिखी है आ बाल्की और सवानंद किरकिरे ने, निर...
Film Review | Hindi Medium | हिंदी मीडियम
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Film Review | Hindi Medium | हिंदी मीडियम

अमीर और गरीब के बीच झूलते मध्यवर्ग का द्वंददीप जगदीप सिंहकथा-पटकथा - साकेत चौधरी और ज़ीनत लखानी संवाद - अमितोश नागपालहिंदी मीडियम उस शुद्ध मध्यमवर्ग की फ़िल्म है जिसे गरीब से एलर्जी हो जाती है और अमीरों की नकल ना करे तो जुलाब लग जाते हैं, फिर अमीर दिखते-दिखते चाहे वह सड़क पर ही क्यों ना   आ जाए। लेकिन यह सिर्फ़ आर्थिक आधार पर वर्ग विभाजन की ही फ़िल्म नहीं है, यह भाषा और शैक्षिण ढांचे के विभाजन की भी फ़िल्म है जो आर्थिक वर्ग विभाजन की रेखा को ना सिर्फ़ और गहरा करता है, बल्कि बनाए रखने पर पूरी तरह से अमादा है। हिंदी मीडियम दोहरी मध्यवर्गीय मानसिकता पर चुटीला व्यंग्य तो करती है लेकिन ख़ुद ही अतिरेकता, रूढ़ीवाद और विरोधाभासों का शिकार भी हो जाती है। बावजूद इसके यह एक अर्थपूर्ण मनोरंजक फ़िल्म है।राज बतरा (इरफ़ान ख़ान) दिल वालों की दिल्ली के दिल चांदनी चौक में कपड़ों का आलीशान शोरूम चलाता है ज...
Film Review | Mukti Bhawan | फ़िल्म समीक्षा | मुक्ति भवन
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Film Review | Mukti Bhawan | फ़िल्म समीक्षा | मुक्ति भवन

मौत के बहाने ज़िंदगी की बातदीप जगदीप सिंह | रेटिंग 3/5लेखक/निर्देशक - सुभाशीष भुटियानी कलाकार - ललित बहल, आदिल हुसैन, गीतांजली कुलकर्णी, पालोमी घोष, नवनिंदरा बहल, अनिल के रस्तोगीजिस विषय पर भारतीय समाज बात करना भी अपशगुन मानता है, उस विषय पर ना सिर्फ फ़िल्म बनाई जा सकती है,   बल्कि भारतीय सिनेमा घरों में दिखाई भी जा सकता है, निर्देशक सुभाशीष भुटियानी की सबसे बड़ी उपलब्धी तो यही मानी जानी चाहिए। मौत के बहाने ज़िंदगी के सबसे सरल और सूक्ष्म पहलुओं की बात करती हुई मुक्ति भवन तन की मुक्ति के साथ-साथ मन की मुक्ति का रास्ता भी दिखाती है।इक रात सपना देखने के बाद सतत्तर वषीर्य दयानंद कुमार (ललित बहल) को अहसास होता है कि उनका अंत समय आ गया है, अगले ही दिन रात का ख़ाना ख़ाते वक्त वह अपने बीमा कंपनी में नौकरी करने वाले अति व्यस्त बेटे राजीव (आदिल हुसैन), बहू लता (गीतांजली कुलकर्णी) और...
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Film Review | Phillauri

फिलौरी : फिलौर की धरोहर की पैसेंजर ट्रेनदीप जगदीप सिंहRating 2/5Cast - Anushka Sharma, Diljit Dosanjh, Suraj Sharma, Raza MuradWriter - Avnita Dutt | Director - Anshai Lalकुछ फिल्में उतनी ही मज़ेदार होती हैं, जितनी वह ट्रेलर में नज़र आती हैं। ऐसी फिल्में ट्रेलर में जितनी हट के लगती हैं, बस उतनी ही हट के होती हैं।   ख़ास कर तब जब इन हट के लगने वाली फिल्मों के लिए माहौल ज़ोरदार प्रमोशन से बनाया जाए। ऐसी फिल्मों को बेहद उम्मीद लेकर देखना आम तौर पर जोखिम भरा होता है। फिलौरी ऐसी ही ओवर हाईप्ड हटके फिल्म है जिसे ट्रेलर से आगे देखना भारी पड़ सकता है।रईसज़ादा रैपर कनन (सूरज शर्मा) तीन साल कैनेडा में रहने के बाद अपनी बचपन की प्रेमिका अनु (महरीन कौर पीरज़ादा) से शादी करने के लिए अमृतसर लौटता है। अभी वह जहाज़ में सोते हुए सपने में ही घोड़ी चढ़ा है कि उसे अपनी शादी में आने वाली बाधाएं नज़र आने लगी हैं। बं...
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Film Review इरादा: ज़हर से जंग का

*दीप जगदीप सिंह*रेटिंग - साढ़े तीन बटे पांचइरादा पंजाब की कोख में फैलते ज़हर की कहानी है, जो असलियत के बेहद करीब भी है और उसमें थोड़ी सी फिल्मी अतिरेकता भी है। लेकिन यह अतिरेकता हर आम पंजाबी के अंदर धधकते लावे की शिनाख्त करती है, जिसे पाॅप कल्चर और नशाखोरी ने दबा के रखा है।   पंजाब की उपजाऊ भूमि का केंद्र और अनाज का भंडार कहे जाने वाला बठिंडा शहर, जो अपने थर्मल प्लांट की गंगनचुंबी चिमनियों और विहंगम तेल रिफाइनरी से पहचाना जाता है। उसके बीचों-बीच बनी झील और गुज़रती नहर भी इसकी एक ख़ास निशानी हैं। उसी शहर में रिटायटर्ड फौजी अफ़सर प्रभजीत वालिया (नसीरूदीन शाह) अपनी जवान होती बेटी रिया (रूमाना मोला) के सपनों को एक अनुशासन से तरतीब देने की जदोजहद में लगा हुआ है। एक दिन अचानक एक ख़तरनाक बीमारी आकर रिया की आखों से प्रभजीत के देखे सपनों पर वक्त की ऐसी सुई चुभती है, जो सब कुछ ख़त्म कर देती है। रिटा...