Film Review | Mukti Bhawan | फ़िल्म समीक्षा | मुक्ति भवन

मौत के बहाने ज़िंदगी की बात

दीप जगदीप सिंह | रेटिंग 3/5

लेखक/निर्देशक – सुभाशीष भुटियानी 
कलाकार – ललित बहल, आदिल हुसैन, गीतांजली कुलकर्णी, पालोमी घोष, 
नवनिंदरा बहल, अनिल के रस्तोगी
जिस विषय पर भारतीय समाज बात करना भी अपशगुन मानता है, उस विषय पर ना सिर्फ फ़िल्म बनाई जा सकती है,

 

बल्कि भारतीय सिनेमा घरों में दिखाई भी जा सकता है, निर्देशक सुभाशीष भुटियानी की सबसे बड़ी उपलब्धी तो यही मानी जानी चाहिए। मौत के बहाने ज़िंदगी के सबसे सरल और सूक्ष्म पहलुओं की बात करती हुई मुक्ति भवन तन की मुक्ति के साथ-साथ मन की मुक्ति का रास्ता भी दिखाती है।

इक रात सपना देखने के बाद सतत्तर वषीर्य दयानंद कुमार (ललित बहल) को अहसास होता है कि उनका अंत समय आ गया है, अगले ही दिन रात का ख़ाना ख़ाते वक्त वह अपने बीमा कंपनी में नौकरी करने वाले अति व्यस्त बेटे राजीव (आदिल हुसैन), बहू लता (गीतांजली कुलकर्णी) और पोती सुनिता (पालोमी घोष) के सामने घोषणा कर देते हैं कि अपना अंतिम समय बिताने के लिए वह वाराणसी के गंगा घाट स्थित मुक्ति भवन जाना चाहते हैं। मुक्ति भवन वह होटल है जहां पर लोग इस विश्वास के साथ अंतिम समय बिताने जाते हैं कि वहां पर मृत्यु प्राप्त करने से मोक्ष मिलता है। वहां पर रहने के लिए सिर्फ़ पंद्रह दिन के लिए कमरा मिलता है, ख़ाने-पीने से लेकर नहाने धोने का इंतज़ाम ख़ुद करना होता है, ज़रूरत पड़ने पर अंतिम-संस्कार का इंतज़ाम होटल का मैनेजर मिसराजी (अनिल के रस्तोगी) तुरंत करवा देते हैं। पत्नी की फटकार, बीमा कंपनी के टारगेट पूरे करने और बाॅस के प्रति जवाबदेही के दबाव में बड़ी मुश्किल और अनमने मन से राजीव अपने पिता के साथ कानपुर से बनारस के मुक्ति भवन जाने के लिए राज़ी हो जाता है। क्या अपने पिता जी कि तरह दयानंद भी दसवें दिन मोक्ष पा लेंगे या मुक्ति भवन से घर लौट आएंगे? पिता के जीवन के अंतिम सफ़र में बेटा कहां तक साथ निभा पाएगा? मुक्ति भवन की कथा-पटकथा इन्हीं दो सवालों के गिर्द घूमती है।
Film Review | Mukti Bhawan | फ़िल्म समीक्षा | मुक्ति भवन
विषय की बात करते ही लगता है कि फ़िल्म काफ़ी बोझिल, नीरस और उपदेशात्मक होगी, लेकिन सुभाशीष भुटियानी मौत और जीवन के मध्य हल्की फुल्की गुदगुदी और जीवन के रसों का ऐसा संतुलन बनाते हैं कि आप पटकथा के साथ बहते चले जाते हैं। तेज़ रफ़तार फिल्मों के शौकीनों को यह फ़िल्म धीमी लग सकती है लेकिन जिस ख़ूबसूरती से भूटियानी ने डिटेलिंग पर काम किया है वह विषय की मांग के अनुरूप है। कई बार महसूस होता है कि जो भी होना है जल्दी हो लेकिन उस होने ना होने के मध्य जो होता है, वह दर्शक को पर्दे से जोड़े रखता है। बतौर लेखक भूटियानी ने बाप-बेटे, दादा-पोती, पति-पत्नी और भाई-बहन के रिश्तों में बेहद यथार्थपरक दृश्य बुने हैं।

सुनीता और मिसरा जी जहां अपने-अपने स्वभाव की वजह से गुदगुदाते हैं, वहीं बाप बेटे और पति पत्नी के आपसी अंतर विरोधों से भी हंसी छूटती है। वहीं दयानंद की बिमला (नवनिंदरा बहल) से दोस्ती सकारात्मकता और आत्मीयता का एक सुखद अहसास लाती है। जिस होटल में सब अपनी मृत्यु का इंतज़ार करने के लिए रुके हैं वहां इतनी अपनेपन से खाने का साथ आचार परोसना भी अपनेपन का अहसास लाता है। राजीव बेटी का बाप होते हुए सख़्त पिता है, लेकिन बचपन में अपने पिता की सख़्ती का उसे मलाल है, जिस वजह से उसकी कविता छूट गई, जबकि उस सख़्त पिता को मलाल है कि उसके बेटे की कविता क्यों छूट गई और वह उसकी पोती के साथ इतना सख़्त क्यों है। यही नहीं बेटे की दिन भर की भाग दौड़ से उकताया दयानंद एक रात राजीव को चहलकदमी के लिए गंगाघाट पर ले जाता है। हल्के-फुल्के अंदाज़ में अपनी दो अंतिम इच्छाएं बताता है, पहली अगले जन्म में कंगारू बनना ताकि सब कुछ अपनी प्राकृतिक पाॅकेट में रख सके, इस पर दोनों ठहाके लगा और उसकी मौत पर शोक नहीं जशन मने। राजीव के पूछने पर कि दयानंद को क्यूं लगा कि उसका जाने का वक्त आ गया है, उसका जवाब होता कि उसे लगने लगा है कि अब वह अनवांटेड है। बेटे से बाप का यह पुर्नमिलन, फ़िल्म को शिख़र पर ले जाता है। फ़िल्म का सबसे शक्तिशाली हिस्सा इसका अंत है और अंत मौत के जशन के साथ होता है। फ़िल्म हिंदु संस्कृति की रस्मों-रिवाज़ों के फलसफ़े को उजागर करते हुए आज के दौर में कर्मकांडों और दिखावे के मोक्ष पर कटाक्ष भी करती है। बदलते दौर में घटते पारिवारिक मुल्यों और भाषा (शोक संदेशों तक) में गिरावट पर भी व्यंग्य करती है।
अदाकारी के मामले में सब एक से बढ़ कर एक हैं, मृत्यु के किनारे पिता की मनोस्थिति को ललित बहल ने पूरी तन्मयता से पर्दे पर उतारा है तो आदिल हुसैन बाप, पत्नी, बेटी और अधिकारी के बीच पिसते एक अधेड़ होते किरदार की बेचैनी, बेबसी और मानसिकता को पूरी सहजता से पेश करते हैं। पत्नी के रूप में गीतांजली भारतीय संयुक्त परिवार की महिलाओं की जटिलताओं और मन की उलझनों को प्रस्तुत करती हैं। पालोमी गुप्ता सुनीता के रूप में संस्कारी बेटी और दृढ़ इरादे वाली पोती के साथ-साथ आधुनिक मध्यवगीर्य युवती का पूरी शिद्दत से प्रतिनिधित्व करती हैं। बिमला के किरदार में नवनिंदरा बहल फ़िल्म में एक नई उर्जा और प्रेरणा के रूप में तरोताज़गी भरती हैं। ताजदार जुनैद की गिटार की तारों से निकलता बैकग्राउंड स्कोर कहानी को अहसासों की तरंग देता है। डेविड और माईकिल के कैमरे से वाराणसी की सांस्कृतिक पहचान हूबहू पर्दे पर उतरी है, जिसमें नाटीयकता से ज़्यादा यथार्थकता नज़र आती है। वारानसी के बाज़ारों की तंग गलियों से लेकर, घाटों से होते हुए शमशान भूमि तक अपना माहौल लेकर कथानक का हिस्सा बनते हैं।

एक भावुक विषय पर एक संवेदनशील फ़िल्म के रूप में होटेल साल्वेशन के नाम से अंतरराष्ट्रीय फिल्म उत्सवों में झंडे गाढ़ चुकी मुक्ति भवन के अंत में आई कविता की यह दो पंक्तियां ‘मन की करो मन सच्चा/बाकी सब झूठा’ बिना प्रवचन बने जीवन का एक गहरा सार दे जाती हैं। उससे पहले नवनिंदरा बहल का संवाद ‘कुछ करने से मौत नहीं आती, अपने मन से आती है’ के ज़रिए ‘मन के हारे हार है मन के जीते जीत’ की उक्ति को पुनःस्थापित करता है। तेज़ रफ़तार दौर में मौत और ज़िंदगी के बीच फैले जाने पहचाने रिश्तों के सफ़र को अपने से अलग खड़े रह कर देखने के लिए यह फ़िल्म ज़रूर देखी जा सकती है।
*दीप जगदीप सिंह स्वतंत्र पत्रकार, पटकथा लेखक व गीतकार हैं।
www.facebook.com/deepjagdeepsingh
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