punjabi stories

पंजाबी कहानी । नाविक का फेरा । अमृता प्रीतम
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पंजाबी कहानी । नाविक का फेरा । अमृता प्रीतम

मर्द-औरत का रिश्ता, आदम और हव्वा के ज़माने से एक अबूझ पहेली रहा है। समाज, राजनीति, न्यास व्यवस्था, रोज़गार और अकांक्षाएं इस पहेली को और भी गहरा कर देते हैं। प्रख्यात लेखिका अमृता प्रीतम औरत-मर्द के रिश्ते और प्रेम की गहराईयों को बड़ी बेबाकी से शबदों में उतराने के लिए जानीं जाती हैं। उन्हीं की कलम से उपजी पंजाबी कहानी ‘मलाह दा फेरा’ के ज़रिए वह इस रिश्ते को यथार्थवादी पात्रों के ज़रिए एक फंतासी संसार में ले जाती हैं। कहानी के अंत तक आप यही समझते हैं कि यह हाड़-मांस के पात्र हैं, लेकिन अंतिम पंक्तियों तक आते-आते पता चलता है कि यह पात्र हमारी कल्पनाओं से उपजे हैं। क्या हैं वह कल्पनाएं, जानने के लिए पढ़िए कहानी का हिंदी अनुवाद-सागर किनारे भीड़ जमा थी। हर उम्र, मज़हब, वेषभूषा के लोग।कुछ समंदर के सीने को बड़ी ईप्सा से नज़र के आखरी छोर तक देख रहे थे। कुछ नज़रें भीड़ में इस तरह व्यस्त थी जैसे समंदर से कोई वास्...
पंजाबी कहानी । मां-बेटियां । मनमोहन बावा
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पंजाबी कहानी । मां-बेटियां । मनमोहन बावा

लड़कियों के लिए प्रेम आज भी टैबू है। वह प्रेम कर तो सकती हैं, प्रेम के बारे में बात नहीं कर सकती। लड़कियां केवल समाज से, परिवार से, मां से छिप कर ही प्रेम कर सकती हैं और फिर उसकी परकाष्ठा को वक्त और किस्मत के सहारे छोड़ देने के लिए मजबूर होती हैं। यह सच केवल ग्रामीण क्षेत्रों की ही नहीं शहरी मध्यवगीर्य लड़कियों का भी सच है। इस तरह पीढ़ी दर पीढ़ी लड़कियों के लिए प्रेम का मतलब बस घर के किसी कोने में सहेज के रखा वह ब्लैक-बाॅक्स होता है, जिसमें उसके प्रेम की समृतियां कैद है। मनमोहन बावा की पंजाबी कहानी मां-बेटियां एक अतीत के एक पुराने ब्लैक-बाॅक्स और वर्तमान में समृतियां समेट रहे नए ब्लैक-बाॅक्स के अंर्तद्वंद की ऐसी ही कहानी है। क्या इक्कसवीं सदी की मां-बेटियां मिल कर प्रेम के इस ब्लैक-बाॅक्स के अस्तित्व को कोई नया आयाम दे पातीं हैं, जानने के लिए पढ़िए कहानी का यह हिंदी अनुवाद-पिछले आठ दस दिनों स...
पंजाबी कहानी | चक दे इंडिया | बलदेव सिंह
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पंजाबी कहानी | चक दे इंडिया | बलदेव सिंह

1990 के बाद की खुली अर्थव्यवस्था के बाद देश ने जैसे ख़ुद को इंडिया और भारत में बंटते देखता है, उसे हम अनदेखा तो कर सकते हैं नज़रअंदाज़ नहीं। इंडिया में रहते हुए बीएमडब्लयू में किसी हीरोईन की कमर सी बल खाती सड़क पर जब हम किसी चैराहे पर रूकते हैं तो ना चाहते हुए भी भारत हाथ फैलाए हमारे सामने आ खड़ा होता है। इंडिया की चकाचैंध में पनप रहा यह भारत असल में कैसे अपनी ज़िंदगी जीता है, सड़कनामा के लिए चर्चित पंजाबी कथाकार बलदेव सिंह अपनी कहानी 'मैं हँस ना सका' में इस अंतरद्वंद को बाखूबी पेश करते हैं। इस कहानी का हिंदी अनुवाद 'चक दे इंडिया' आॅनलाईन पाठकों के लिए प्रस्तुत है-मुहल्ले की ख़ाली जगहों पर, वह परिवार देखते-देखते छे-सात जगह बदल चुका था। सबसे पहले उन्हें मैंने अपने घर के पिछवाड़े, खाली प्लाट में देखा। दो ही दिन में उन्होंने अपनी झुग्गी बना ली। आसपास से ईंट पत्थर जुटा कर चूल्हा जलाने के ल...
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पंजाबी कहानी | लबारी | जतिंदर सिंह हांस

आज के दौर की सबसे बड़ी त्रासदी कोई बीमारी नहीं बल्कि अकेलापन है, जो यूवा पीढ़ी से लेकर उम्रदराज़ पीढ़ी को अंदर ही अंदर खाए जा रहा है। यूवा पंजाबी कथाकार जतिंदर सिंह हांस अपनी पंजाबी कहानी लूतरो में दो पीढ़ियों के अकेलेपन को अपनी दो महिला पात्रों के ज़रिए बाखूबी पेश कर रहें हैं। सोशल मीडिया के दौर में हर पल पूरी दुनिया से जुड़ा रहने वाला आज का मानव असल में कितना अकेला है, इस कहानी के ज़रिए यह मर्म देखा जा सकता है। प्रस्तुत है लूतरो का हिंदी अनुवाद लबारी-मन करता है कमज़ात को चोटी पकड़ घर से निकाल दूं। हाथ भर की ज़बान, कैंची की तरह चलती है, इसे मैं लबारी कहती हूं। ब्लड-प्रैशर बढ़ा हो तो बहुत कुछ कह देती हूं, चिकने घड़े जैसी है, कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता। बस हंसती रहती है। कई बार तो मेरा ब्लड प्रैशर इस बात से बढ़ जाता है कि गधे की बच्ची को इतनी हंसी आती कहां से है! फिर मुझे गोली खानी पड़ती है। कलमुंही कल न...