Sunday, August 7

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Film Review | Mom | फ़िल्म | समीक्षा मॉम
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Film Review | Mom | फ़िल्म | समीक्षा मॉम

-दीप जगदीप सिंह-रेटिंग 3/5 कथा - रवि उदयावर गिरीश कोहली कोना वेंकेट राओपटकथा एवं संवाद - गिरीश कोहली निर्देशक - रवि उदयावरमॉम मैम से मां बनने की कहानी है। यह एक मां की कहानी है, जिसे उम्मीद है कि उसकी बेटी एक दिन उसे मैम नहीं मां कहेगी। यह एक बेटी की भी कहानी है जो सोचती है कि 'मां की ज़िंदगी में बेटी आती है ना कि बेटी की ज़िंदगी में मां आती है।' मॉम एक बार फ़िर यह भी प्रमाणित करती है कि पालने-पोसने वाली मां भी जन्म देने वाली मां जितनी ही ममतामयी हो सकती है। इसके अलावा मॉम कानून और न्याय व्यवस्था के चरमरा कर ध्वस्त हो चुके उस दौर की भी कहानी है, जो अराजकता पनपने के लिए उर्वर भूमि प्रदान करने का माहौल पैदा करता है। बॉयलॉजी टीचर देविका (श्रीदेवी) पढ़ाई और अनुशासन के मामले में सख़्त भी है और पढ़ाई को रोमांचक बनाने जितनी आधुनिक भी। दुनिया की नज़र में वह अपने बिजनेसमैन पति आनंद (अदनान सद्दीकी),...
Film Review | Hindi Medium | हिंदी मीडियम
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Film Review | Hindi Medium | हिंदी मीडियम

अमीर और गरीब के बीच झूलते मध्यवर्ग का द्वंददीप जगदीप सिंहकथा-पटकथा - साकेत चौधरी और ज़ीनत लखानी संवाद - अमितोश नागपालहिंदी मीडियम उस शुद्ध मध्यमवर्ग की फ़िल्म है जिसे गरीब से एलर्जी हो जाती है और अमीरों की नकल ना करे तो जुलाब लग जाते हैं, फिर अमीर दिखते-दिखते चाहे वह सड़क पर ही क्यों ना   आ जाए। लेकिन यह सिर्फ़ आर्थिक आधार पर वर्ग विभाजन की ही फ़िल्म नहीं है, यह भाषा और शैक्षिण ढांचे के विभाजन की भी फ़िल्म है जो आर्थिक वर्ग विभाजन की रेखा को ना सिर्फ़ और गहरा करता है, बल्कि बनाए रखने पर पूरी तरह से अमादा है। हिंदी मीडियम दोहरी मध्यवर्गीय मानसिकता पर चुटीला व्यंग्य तो करती है लेकिन ख़ुद ही अतिरेकता, रूढ़ीवाद और विरोधाभासों का शिकार भी हो जाती है। बावजूद इसके यह एक अर्थपूर्ण मनोरंजक फ़िल्म है।राज बतरा (इरफ़ान ख़ान) दिल वालों की दिल्ली के दिल चांदनी चौक में कपड़ों का आलीशान शोरूम चलाता है ज...
Film Review | Mukti Bhawan | फ़िल्म समीक्षा | मुक्ति भवन
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Film Review | Mukti Bhawan | फ़िल्म समीक्षा | मुक्ति भवन

मौत के बहाने ज़िंदगी की बातदीप जगदीप सिंह | रेटिंग 3/5लेखक/निर्देशक - सुभाशीष भुटियानी कलाकार - ललित बहल, आदिल हुसैन, गीतांजली कुलकर्णी, पालोमी घोष, नवनिंदरा बहल, अनिल के रस्तोगीजिस विषय पर भारतीय समाज बात करना भी अपशगुन मानता है, उस विषय पर ना सिर्फ फ़िल्म बनाई जा सकती है,   बल्कि भारतीय सिनेमा घरों में दिखाई भी जा सकता है, निर्देशक सुभाशीष भुटियानी की सबसे बड़ी उपलब्धी तो यही मानी जानी चाहिए। मौत के बहाने ज़िंदगी के सबसे सरल और सूक्ष्म पहलुओं की बात करती हुई मुक्ति भवन तन की मुक्ति के साथ-साथ मन की मुक्ति का रास्ता भी दिखाती है।इक रात सपना देखने के बाद सतत्तर वषीर्य दयानंद कुमार (ललित बहल) को अहसास होता है कि उनका अंत समय आ गया है, अगले ही दिन रात का ख़ाना ख़ाते वक्त वह अपने बीमा कंपनी में नौकरी करने वाले अति व्यस्त बेटे राजीव (आदिल हुसैन), बहू लता (गीतांजली कुलकर्णी) और...
Film Review | Naam Shabana
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Film Review | Naam Shabana

नाम शबाना: नाम बड़े और दर्शन छोटेदीप जगदीप सिंह | रेटिंग 1.5/5देश की ख़ूफिया ऐजंसियों में जासूस कैसे चुने जाते हैं, उन्हें कैसे परशिक्षण से गुज़रना पड़ता है, उनकी ज़िंदगी कैसे गुमनामी की मौत मरती है और कैसे वह अपने देश के लिए अपने आप और अपने परिवार के लिए भी बेगाने हो जाते हैं,   अगर आप यह सब जानना चाहते हैं तो नाम शबाना देखी जा सकती है, लेकिन अगर आप एक अर्थपूर्ण सधी हुई फिल्म देखने जाएंगे तो आप को निराशा हो सकती है। क्यों? आईए बताते हैं-शबाना ख़ान (तापसी पन्नू) एक ज़िद्दी, मज़बूत और आत्म-सम्मान वाली मध्यम वर्गीय लड़की है जो काॅलेज में पड़ती है और अपनी विधवा मां के साथ रहती है। उसके चेहरे पर हमेशा सख़्त हाव-भाव रहते हैं और वह अपनी पढ़ाई और कराटे की ट्रेनिंग पर पूरा ध्यान लगाए रखती है। जय (ताहिर शब्बीर मिठाईवाला) उसका दोस्त व बाईक ड्राइवर है जो उससे प्यार करता है, उसके नखरे झेलता है औ...
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Film Review | Phillauri

फिलौरी : फिलौर की धरोहर की पैसेंजर ट्रेनदीप जगदीप सिंहRating 2/5Cast - Anushka Sharma, Diljit Dosanjh, Suraj Sharma, Raza MuradWriter - Avnita Dutt | Director - Anshai Lalकुछ फिल्में उतनी ही मज़ेदार होती हैं, जितनी वह ट्रेलर में नज़र आती हैं। ऐसी फिल्में ट्रेलर में जितनी हट के लगती हैं, बस उतनी ही हट के होती हैं।   ख़ास कर तब जब इन हट के लगने वाली फिल्मों के लिए माहौल ज़ोरदार प्रमोशन से बनाया जाए। ऐसी फिल्मों को बेहद उम्मीद लेकर देखना आम तौर पर जोखिम भरा होता है। फिलौरी ऐसी ही ओवर हाईप्ड हटके फिल्म है जिसे ट्रेलर से आगे देखना भारी पड़ सकता है।रईसज़ादा रैपर कनन (सूरज शर्मा) तीन साल कैनेडा में रहने के बाद अपनी बचपन की प्रेमिका अनु (महरीन कौर पीरज़ादा) से शादी करने के लिए अमृतसर लौटता है। अभी वह जहाज़ में सोते हुए सपने में ही घोड़ी चढ़ा है कि उसे अपनी शादी में आने वाली बाधाएं नज़र आने लगी हैं। बं...
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Film Review इरादा: ज़हर से जंग का

*दीप जगदीप सिंह*रेटिंग - साढ़े तीन बटे पांचइरादा पंजाब की कोख में फैलते ज़हर की कहानी है, जो असलियत के बेहद करीब भी है और उसमें थोड़ी सी फिल्मी अतिरेकता भी है। लेकिन यह अतिरेकता हर आम पंजाबी के अंदर धधकते लावे की शिनाख्त करती है, जिसे पाॅप कल्चर और नशाखोरी ने दबा के रखा है।   पंजाब की उपजाऊ भूमि का केंद्र और अनाज का भंडार कहे जाने वाला बठिंडा शहर, जो अपने थर्मल प्लांट की गंगनचुंबी चिमनियों और विहंगम तेल रिफाइनरी से पहचाना जाता है। उसके बीचों-बीच बनी झील और गुज़रती नहर भी इसकी एक ख़ास निशानी हैं। उसी शहर में रिटायटर्ड फौजी अफ़सर प्रभजीत वालिया (नसीरूदीन शाह) अपनी जवान होती बेटी रिया (रूमाना मोला) के सपनों को एक अनुशासन से तरतीब देने की जदोजहद में लगा हुआ है। एक दिन अचानक एक ख़तरनाक बीमारी आकर रिया की आखों से प्रभजीत के देखे सपनों पर वक्त की ऐसी सुई चुभती है, जो सब कुछ ख़त्म कर देती है। रिटा...
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Film Review | कुंग फू योगा। अब तेरा क्या होगा जैकी!

दीप जगदीप सिंहरेटिंग 1/5प्रोफैस़र जैक (जैकी चैन) चीन के ज़ियान के टैराकोटा वारियर म्यूज़ियम में पुरातत्व विशेषज्ञ है जिसने रंगों को पुनःजीवित करने की तकनीक खोजी है और अपनी उम्र महत्वपूर्ण पुरात्तव अवशेषों को ढूंढ कर उन्हें पुनः स्थापित करने और उनके योग्य वारिसों को सौंपने में लगा दी है।   मगध की राजकुमारी अस्मिता (दिशा पटानी) सदियों से खोए हुए अपने पुश्तैनी ख़ज़ाने को खोजने के लिए चालाकी से जैक को हिंदुस्तान बुलाती है। लेकिन ख़जाने को खोजना और हासिल करना इतना आसान नहीं है क्योंकि मगध साम्राज्य के दुश्मन का वंशज रंदाल (सोनू सूद) आज भी अपने पूर्वजों की इस ख़ज़ाने पर कब्ज़ा जमाने की इच्छा को पूरा करना चाहता है। यहीं से ख़ज़ाने को हासिल करने की चूहा-दौड़ शुरू होती है और प्रमुख किरदारों को चीन, तिब्बत, दुबई और हिंदुस्तान की विभिन्न लोकेशन्स पर दौड़ाती रहती है, जो ना तो कहानी का कोई सिरा पकड़ती है ...
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Film Review | दंगल धाकड़ है!

दीप जगदीप सिंहरेटिंग 4/5हिंदी सिनेमा के जंगल में बड़े-बड़े सूपर स्टार पहलवान आते हैं अखाड़े में दांव लगाते हैं कुछ कई सौ करोड़ की ट्राफी जीत कर भी चारो खाने चित्त हो जाते हैं और कई बाॅक्स आॅफिस के खोपचे में सांस लेने से पहले ही दम तोड़ देते लेकिन उनका दांव ऐसा होता जो दर्शकों के दिल पर धोबी पछाड़ दे देता है।   उनमें से कुछ एक पहलवान बस अपनी पीठ थपथपाते रहते हैं, लेकिन जो दर्शकों का दिल जीतता है वो असली पहलवान कहानी  होती है। दंगल में भी जो असली पहलवान है, वह कहानी है, इसी लिए दंगल धाकड़ है और बाॅक्स आॅफिस पर दंगल का मंगल लंबा चलेगा।यूं तो दंगल की कहानी प्रिडिक्टेबल है और उसी तैय पटड़ी पर दौड़ती है जिसके अंत में नायक हर मुश्किल को पार करते हुए जीत जाता है। दंगल को देखते हुए यह भ्रम पैदा हो सकता है कि असल में नायक कौन है। अपना सपना पूरा करने के लिए समाज की हर परंपरा तोड़ने और दुनिया भर से द...
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Film Review | सुल्तान

पहलवानी सुल्तानी मसाला बिरयानी दीप जगदीप सिंहरेटिंग 2/5अगर आप सलमान ख़ान के फ़ैन हैं तो आपको यह समीक्षा आपके लिए बिल्कुल नहीं है। अगर आप सलमान के एक दिन भाई-भाई टाईप फैन हैं तो आप इससे आगे बिल्कुल भी मत पढ़िएगा। हां, अगर आप शाहरूख़ ख़ान की 'फ़ैन' वाले फैन हैं तो आप इसे अंत तक ज़रूर पढ़िए। अरे! अरे! रूकिए, सीधे क्लाईमैक्स पर मत जाईए! यहीं से पढ़ते जाएं...Film Review | Sultan | अनुष्का ने लगाया सलमान को धोबी पछाड़ वह अपनी दमदार सीना दिखाता है। वह फ्रेम में आती है। वह पहली नज़र में प्यार में पड़ जाता, अपनी कलाबाज़ियां दिखाता है। वह उसके प्यार में पागल हो जाती है।   एक अजीब से ढिनचक डांस स्टेप वाला गाना आता है। फिर अचानक एक ख़तरनाक उथल-पुथल होती है और लेंटर तोड़ एक्शन के साथ सब सुल्ट जाता है। अगर आप सलमान ख़ान की सुल्तान से इस तरह की उम्मीद कर रहे हैं तो आप बहुत ज़्यादा उम्मीद क...
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Film Review | सरदारजी 2

दीप जगदीप सिंहरेटिंग 1/5सबसे पहले बात यह कि सरदारजी 2 का पहले भाग से कोई लेना-देना नहीं है। इस लिए इसमें ना भूत पकड़ने वाला है, ना बोतल में बंद शरारती भूत हैं, ना ही हसीन भूतनी है और ही भूत पकड़ने का चक्कर है।   इस बार जगजीत सिंह उर्फ जग्गी खूह वाला (दिलजीत दोसांझ) एक सफल किसान बना है। प्राकृतिक तरीके से खेती करके उसने कई पुरस्कार जीते हैं और मनमौजी दिखने वाले जग्गी के बेकाबू गुस्से से सारा गांव वाकिफ़ है। गुस्से में वह कोई ना कोई पंगा करता ही रहता है और इस बार का पंगा उसे कुछ ज़्यादा ही महंगा पड़ गया है। उसे या तो छह महीने में अपनी पुश्तैनी ज़मीन, जिसके ज़रिए पूरे गांव को, पानी मिलता है वह छोड़नी होगी या फिर डेढ़ करोड़ हर्जाना भरना होगा। बस फिर क्या था अपनी ज़मीन और गांव की खेती बचाने के लिए वह डेढ़ करोड़ का इंतज़ाम करने उड़ जाता है आॅस्ट्रिेलिया। वहां जाकर भी मुसीबतें उसका पीछा नहीं छोड़ती। क्या व...