नसीरुद्दीन शाह
हिंदी अनुवाद: दीप जगदीप सिंह

जब से मैंने अभिनेता बनने के लिए ज़रूरी जोशीले, लेकिन अक्सर समझ में न आने वाले काम सीखने शुरू किए, तभी से मेरी यह इच्छा रही कि जो कुछ मैंने सीखा है, उसे अपने से अगली पीढ़ी के उन युवाओं के साथ साझा करूँ जो मेरी तरह सही मार्गदर्शन से वंचित रहे। पिछले चालीस से भी ज़्यादा वर्षों में, अलग-अलग संस्थानों में और निजी तौर पर, मेरे काम से जुड़े सबसे सुखद और सीख देने वाले अनुभव विद्यार्थियों के साथ ही रहे हैं। मैंने उनकी प्रगति में योगदान देने की कोशिश की है। कई बार सफलता नहीं मिली, लेकिन खुशी कभी कम नहीं हुई। सपने देखने वाले और कभी-कभी झिझकने वाले विद्यार्थियों तक अपनी बात पहुँचाने की कोशिश ने समय के साथ मेरी स्वाभाविक बेसब्री को कुछ हद तक संतुलित किया है। इस सफर में मुझसे कई गलतियाँ भी हुईं, लेकिन मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि विद्यार्थियों के साथ काम करते हुए मैंने किसी भी अभिनय के अध्यापक से ज़्यादा सीखा है।
मुंबई विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग द्वारा 1 फरवरी को आयोजित जश्न-ए-उर्दू एक ऐसा कार्यक्रम था, जिसमें मुझे बुलाया गया था, लेकिन आख़िरी समय में निमंत्रण वापस ले लिया गया। मुझे इस कार्यक्रम का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार था क्योंकि इसके ज़रिए विद्यार्थियों से बातचीत होनी थी। 31 जनवरी की रात, बिना कोई वजह बताए (माफ़ी तो दूर की बात है), मुझे बताया गया कि आने की ज़रूरत नहीं है। शायद उन्हें लगा कि इतना अपमान काफ़ी नहीं था। इसलिए उन्होंने दर्शकों से यह कहकर कि मैंने आने से मना कर दिया, और भी नमक छिड़क दिया।
मुझे हैरानी नहीं हुई कि उनमें यह कहने का साहस नहीं था कि मैं “खुलेआम देश के खिलाफ बोलता हूँ” — जैसे कि अगर मैं चुपचाप बोलता तो ठीक होता! या जैसा कि कहा गया कि विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ऐसा कहा। अगर वे सिर्फ़ लकीर के फ़क़ीर नहीं हैं, बल्कि सच में ऐसा मानते हैं, तो मैं उन्हें चुनौती देता हूँ कि मेरा एक भी ऐसा बयान दिखा दें जिसमें मैंने अपने देश को नीचा दिखाया हो।
सच यह है कि मैंने खुद को “विश्वगुरु” कहने वाले व्यक्ति की कभी तारीफ नहीं की। बल्कि, मैंने उनके तौर-तरीकों की आलोचना की है। उनका आत्ममोह मुझे परेशान करता है और पिछले दस वर्षों में उन्होंने जो किया है, उसमें से किसी भी बात ने मुझे प्रभावित नहीं किया। मैंने सरकार के कई कामों की आलोचना की है और आगे भी करता रहूँगा। मैंने इस बात पर दुख जताया है कि हमारे देश में नागरिकों के प्रति संवेदनशीलता और दूसरों की परवाह कम होती जा रही है। मैंने कई और मुद्दों पर भी खुलकर बात की है, क्योंकि ये बातें मेरे जैसे लोगों को इस दिशा को लेकर चिंतित करती हैं, जिस ओर हम बढ़ रहे हैं। जहाँ छात्र कार्यकर्ता बिना मुकदमे के सालों जेल में पड़े रहते हैं, जबकि दोषी बलात्कारियों और हत्यारों को अक्सर जमानत मिल जाती है; जहाँ गोरक्षा के नाम पर कानून हाथ में लेने वालों को लोगों को घायल करने और मार डालने की खुली छूट मिलती है; जहाँ इतिहास को दोबारा लिखा जा रहा है और पाठ्यपुस्तकों में बदलाव किए जा रहे हैं; जहाँ विज्ञान तक के साथ खिलवाड़ हो रहा है; और जहाँ एक मुख्यमंत्री “मियाँ” को परेशान करने की बात करता है। यह नफ़रत आखिर कब तक चलेगी?
यह वह देश नहीं है जिसमें मैं बड़ा हुआ और जिसे प्यार करना मैंने सीखा था। निगरानी के साथ-साथ “विचारों पर पहरा” और “भ्रम पैदा करने वाली भाषा” पूरी ताकत से लागू हो चुके हैं। “दो मिनट की नफ़रत” अब चौबीस घंटे की नफ़रत बन चुकी है। अगर इन हालात की तुलना जॉर्ज ऑरवेल की किताब 1984 से की जाए, जिसमें “महान नेता” की प्रशंसा न करना गद्दारी माना जाता है, तो क्या इसे हकीकत से बहुत दूर कहना गलत होगा?
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