Monday, June 27

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Film Review | Mom | फ़िल्म | समीक्षा मॉम
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Film Review | Mom | फ़िल्म | समीक्षा मॉम

-दीप जगदीप सिंह-रेटिंग 3/5 कथा - रवि उदयावर गिरीश कोहली कोना वेंकेट राओपटकथा एवं संवाद - गिरीश कोहली निर्देशक - रवि उदयावरमॉम मैम से मां बनने की कहानी है। यह एक मां की कहानी है, जिसे उम्मीद है कि उसकी बेटी एक दिन उसे मैम नहीं मां कहेगी। यह एक बेटी की भी कहानी है जो सोचती है कि 'मां की ज़िंदगी में बेटी आती है ना कि बेटी की ज़िंदगी में मां आती है।' मॉम एक बार फ़िर यह भी प्रमाणित करती है कि पालने-पोसने वाली मां भी जन्म देने वाली मां जितनी ही ममतामयी हो सकती है। इसके अलावा मॉम कानून और न्याय व्यवस्था के चरमरा कर ध्वस्त हो चुके उस दौर की भी कहानी है, जो अराजकता पनपने के लिए उर्वर भूमि प्रदान करने का माहौल पैदा करता है। बॉयलॉजी टीचर देविका (श्रीदेवी) पढ़ाई और अनुशासन के मामले में सख़्त भी है और पढ़ाई को रोमांचक बनाने जितनी आधुनिक भी। दुनिया की नज़र में वह अपने बिजनेसमैन पति आनंद (अदनान सद्दीकी),...
Movie Review | Padman | पैडमैन
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Movie Review | Padman | पैडमैन

दीप जगदीप सिंह | रेटिंग 2.5/5फ़िल्म देखने जाते समय मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि फ़िल्म लेखन के मामले में एक अच्छी पटकथा की उदाहरण हो सकती है। मुझे लगा था कि टाॅयलेट एक प्रेम कथा की तरह ही पैडमैन भी दो घंटे का एक सरकारी विज्ञापन होगी,   लेकिन इस बार फ़िल्म के लेखन ने मुझे प्रभावित किया है और जो लोग फ़िल्म लेखन में रूचि रखते हैं, उन्हें यह समीक्षा अंत तक पढ़नी चाहिए, उन्हें इसमें बेहतर सक्रीन राइटिंग के काफ़ी मंत्र मिलेंगे। चाहे यह एक परफ़ेक्ट फ़िल्म नहीं है लेकिन कहानी के ग्राफ़ और किरदारों के ग्राफ़ के मामले में इस फ़िल्म में काफ़ी कुछ सीखने वाला है।फ़िल्म में अक्षय कुमार बने है लक्ष्मीकांत चौहान उर्फ़ पैडमैन, उनकी पत्नी गायत्री के रोल में है राधिका आप्टे और प्रेमिका और प्रमोटर के रूप में हैं, सोनम कपूर। फ़िल्म का संकल्प है टविंकल खन्ना का और फ़िल्म लिखी है आ बाल्की और सवानंद किरकिरे ने, निर...
Film Review | Padmavat | फ़िल्म रिव्यू | पद्मावत
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Film Review | Padmavat | फ़िल्म रिव्यू | पद्मावत

दीप जगदीप सिंह | रेटिंग 2/5संजय लीला भंसाली की पद्मावत इतिहास नहीं, बल्कि मलिक मोहम्मद जयसी की काव्य कल्पना का दृश्यात्मक वर्णन है। भंसाली के चिरपरिचित अंदाज़ में यह ज़रूरत से ज़्याद खिंचा हुआ और विहंगम बनाने की कोशिश में अत्यधिक डार्क हो गया है।   कहानी बिल्कुल सीधी है, सिंघल की राजकुमारी पद्मावति बला सी खूबसूरत है, जिस पर चितौड़ का रावल रत्न सिंह मोहित होकर उसे ब्याह ले जाता है। उधर दुनिया जीतने की लालसा में अपनो का ही खून बहा कर अलाउदीन खिलजी हिंदुस्तान के तख़्त पर काबिज़ हो जाता है। एक तरफ़ रावल रत्न सिंह पद्मावति के साथ अपनी ज़िंदगी का आनंद ले रहा है तो दूसरी तरफ़ खिलजी पूरी धरती पर अपनी हकूमत चलाने का ख़ाब पूरा करने में जुटा है, तभी एक ऐसी साजिश होती है, जो खिलजी को कहने के लिए मजबूर कर देती है, सरहदें बोहत फैला दी, अब बाहें फैलाएंगेलेकिन यह बाहें वह अमन के लिए नहीं अपनी हवस के लि...
Film Review | Hindi Medium | हिंदी मीडियम
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Film Review | Hindi Medium | हिंदी मीडियम

अमीर और गरीब के बीच झूलते मध्यवर्ग का द्वंददीप जगदीप सिंहकथा-पटकथा - साकेत चौधरी और ज़ीनत लखानी संवाद - अमितोश नागपालहिंदी मीडियम उस शुद्ध मध्यमवर्ग की फ़िल्म है जिसे गरीब से एलर्जी हो जाती है और अमीरों की नकल ना करे तो जुलाब लग जाते हैं, फिर अमीर दिखते-दिखते चाहे वह सड़क पर ही क्यों ना   आ जाए। लेकिन यह सिर्फ़ आर्थिक आधार पर वर्ग विभाजन की ही फ़िल्म नहीं है, यह भाषा और शैक्षिण ढांचे के विभाजन की भी फ़िल्म है जो आर्थिक वर्ग विभाजन की रेखा को ना सिर्फ़ और गहरा करता है, बल्कि बनाए रखने पर पूरी तरह से अमादा है। हिंदी मीडियम दोहरी मध्यवर्गीय मानसिकता पर चुटीला व्यंग्य तो करती है लेकिन ख़ुद ही अतिरेकता, रूढ़ीवाद और विरोधाभासों का शिकार भी हो जाती है। बावजूद इसके यह एक अर्थपूर्ण मनोरंजक फ़िल्म है।राज बतरा (इरफ़ान ख़ान) दिल वालों की दिल्ली के दिल चांदनी चौक में कपड़ों का आलीशान शोरूम चलाता है ज...
अनिल कपूर को आता है दूसरों की जलाने में मज़ा!
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अनिल कपूर को आता है दूसरों की जलाने में मज़ा!

अपने झक्कास अंदाज़ के लिए जाने जाते सदाबहार अभिनेता अनिल कपूर ने अपनी जवानी के दिनों के अपने दिलफेंक अंदाज़ के बारे में रोमांचक ख़ुलासे किए हैं। उन्होंने बताया कि चढ़ती जवानी में कैसे वह बस लड़कियों के चक्कर में पड़े रहते थे और उनकी तमन्ना थी कि उनकी बहुत सारीं गर्लफ्रेन्ड्ज़ हों, लेकिन उनकी यह तमन्ना पूरी ना हो सकी, क्योंकि बहुत जल्दी उनकी शादी हो गई!   अपनी जवानी के दिनों के किस्से, उन दिनों की प्रेमिकाओं के चक्कर, कैसे वह लड़कियों के चक्कर में पड़े रहते थे, उन्होंने स्लमडॉग मिलेनेयर फ़िल्म क्यों साईन की और अब उनके बच्चे कैसे उनका मज़ाक उड़ाते हैं, ऐसे कई रोचक खुलासे हमेशा युवा दिखने वाले और आज भी कईयों की धड़कने तेज़ कर देने वाले अनिल कपूर ने यूटयूबर हनी चवन के साथ एक अतरंग मुलाकात में किए हैं।उन्होंने माना कि वह अपने स्टाईल पर और भी अधिक ध्यान देते अगर उनकी बच्चे उनके आसपास नहीं होते। उनके बच्...
Film Review | Mukti Bhawan | फ़िल्म समीक्षा | मुक्ति भवन
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Film Review | Mukti Bhawan | फ़िल्म समीक्षा | मुक्ति भवन

मौत के बहाने ज़िंदगी की बातदीप जगदीप सिंह | रेटिंग 3/5लेखक/निर्देशक - सुभाशीष भुटियानी कलाकार - ललित बहल, आदिल हुसैन, गीतांजली कुलकर्णी, पालोमी घोष, नवनिंदरा बहल, अनिल के रस्तोगीजिस विषय पर भारतीय समाज बात करना भी अपशगुन मानता है, उस विषय पर ना सिर्फ फ़िल्म बनाई जा सकती है,   बल्कि भारतीय सिनेमा घरों में दिखाई भी जा सकता है, निर्देशक सुभाशीष भुटियानी की सबसे बड़ी उपलब्धी तो यही मानी जानी चाहिए। मौत के बहाने ज़िंदगी के सबसे सरल और सूक्ष्म पहलुओं की बात करती हुई मुक्ति भवन तन की मुक्ति के साथ-साथ मन की मुक्ति का रास्ता भी दिखाती है।इक रात सपना देखने के बाद सतत्तर वषीर्य दयानंद कुमार (ललित बहल) को अहसास होता है कि उनका अंत समय आ गया है, अगले ही दिन रात का ख़ाना ख़ाते वक्त वह अपने बीमा कंपनी में नौकरी करने वाले अति व्यस्त बेटे राजीव (आदिल हुसैन), बहू लता (गीतांजली कुलकर्णी) और...
Film Review | Naam Shabana
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Film Review | Naam Shabana

नाम शबाना: नाम बड़े और दर्शन छोटेदीप जगदीप सिंह | रेटिंग 1.5/5देश की ख़ूफिया ऐजंसियों में जासूस कैसे चुने जाते हैं, उन्हें कैसे परशिक्षण से गुज़रना पड़ता है, उनकी ज़िंदगी कैसे गुमनामी की मौत मरती है और कैसे वह अपने देश के लिए अपने आप और अपने परिवार के लिए भी बेगाने हो जाते हैं,   अगर आप यह सब जानना चाहते हैं तो नाम शबाना देखी जा सकती है, लेकिन अगर आप एक अर्थपूर्ण सधी हुई फिल्म देखने जाएंगे तो आप को निराशा हो सकती है। क्यों? आईए बताते हैं-शबाना ख़ान (तापसी पन्नू) एक ज़िद्दी, मज़बूत और आत्म-सम्मान वाली मध्यम वर्गीय लड़की है जो काॅलेज में पड़ती है और अपनी विधवा मां के साथ रहती है। उसके चेहरे पर हमेशा सख़्त हाव-भाव रहते हैं और वह अपनी पढ़ाई और कराटे की ट्रेनिंग पर पूरा ध्यान लगाए रखती है। जय (ताहिर शब्बीर मिठाईवाला) उसका दोस्त व बाईक ड्राइवर है जो उससे प्यार करता है, उसके नखरे झेलता है औ...
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Film Review | Phillauri

फिलौरी : फिलौर की धरोहर की पैसेंजर ट्रेनदीप जगदीप सिंहRating 2/5Cast - Anushka Sharma, Diljit Dosanjh, Suraj Sharma, Raza MuradWriter - Avnita Dutt | Director - Anshai Lalकुछ फिल्में उतनी ही मज़ेदार होती हैं, जितनी वह ट्रेलर में नज़र आती हैं। ऐसी फिल्में ट्रेलर में जितनी हट के लगती हैं, बस उतनी ही हट के होती हैं।   ख़ास कर तब जब इन हट के लगने वाली फिल्मों के लिए माहौल ज़ोरदार प्रमोशन से बनाया जाए। ऐसी फिल्मों को बेहद उम्मीद लेकर देखना आम तौर पर जोखिम भरा होता है। फिलौरी ऐसी ही ओवर हाईप्ड हटके फिल्म है जिसे ट्रेलर से आगे देखना भारी पड़ सकता है।रईसज़ादा रैपर कनन (सूरज शर्मा) तीन साल कैनेडा में रहने के बाद अपनी बचपन की प्रेमिका अनु (महरीन कौर पीरज़ादा) से शादी करने के लिए अमृतसर लौटता है। अभी वह जहाज़ में सोते हुए सपने में ही घोड़ी चढ़ा है कि उसे अपनी शादी में आने वाली बाधाएं नज़र आने लगी हैं। बं...
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Film Review इरादा: ज़हर से जंग का

*दीप जगदीप सिंह*रेटिंग - साढ़े तीन बटे पांचइरादा पंजाब की कोख में फैलते ज़हर की कहानी है, जो असलियत के बेहद करीब भी है और उसमें थोड़ी सी फिल्मी अतिरेकता भी है। लेकिन यह अतिरेकता हर आम पंजाबी के अंदर धधकते लावे की शिनाख्त करती है, जिसे पाॅप कल्चर और नशाखोरी ने दबा के रखा है।   पंजाब की उपजाऊ भूमि का केंद्र और अनाज का भंडार कहे जाने वाला बठिंडा शहर, जो अपने थर्मल प्लांट की गंगनचुंबी चिमनियों और विहंगम तेल रिफाइनरी से पहचाना जाता है। उसके बीचों-बीच बनी झील और गुज़रती नहर भी इसकी एक ख़ास निशानी हैं। उसी शहर में रिटायटर्ड फौजी अफ़सर प्रभजीत वालिया (नसीरूदीन शाह) अपनी जवान होती बेटी रिया (रूमाना मोला) के सपनों को एक अनुशासन से तरतीब देने की जदोजहद में लगा हुआ है। एक दिन अचानक एक ख़तरनाक बीमारी आकर रिया की आखों से प्रभजीत के देखे सपनों पर वक्त की ऐसी सुई चुभती है, जो सब कुछ ख़त्म कर देती है। रिटा...
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Film Review | कुंग फू योगा। अब तेरा क्या होगा जैकी!

दीप जगदीप सिंहरेटिंग 1/5प्रोफैस़र जैक (जैकी चैन) चीन के ज़ियान के टैराकोटा वारियर म्यूज़ियम में पुरातत्व विशेषज्ञ है जिसने रंगों को पुनःजीवित करने की तकनीक खोजी है और अपनी उम्र महत्वपूर्ण पुरात्तव अवशेषों को ढूंढ कर उन्हें पुनः स्थापित करने और उनके योग्य वारिसों को सौंपने में लगा दी है।   मगध की राजकुमारी अस्मिता (दिशा पटानी) सदियों से खोए हुए अपने पुश्तैनी ख़ज़ाने को खोजने के लिए चालाकी से जैक को हिंदुस्तान बुलाती है। लेकिन ख़जाने को खोजना और हासिल करना इतना आसान नहीं है क्योंकि मगध साम्राज्य के दुश्मन का वंशज रंदाल (सोनू सूद) आज भी अपने पूर्वजों की इस ख़ज़ाने पर कब्ज़ा जमाने की इच्छा को पूरा करना चाहता है। यहीं से ख़ज़ाने को हासिल करने की चूहा-दौड़ शुरू होती है और प्रमुख किरदारों को चीन, तिब्बत, दुबई और हिंदुस्तान की विभिन्न लोकेशन्स पर दौड़ाती रहती है, जो ना तो कहानी का कोई सिरा पकड़ती है ...