Volga Se Ganga Hindi Nisha Chapter 1

This is the front cover art for the book Volga Se Ganga written by Rahul Sankrityayan
आवरण इंटरनेट आर्काईव से साभार

देश: वोल्गा – तट (ऊपरी)
जाति: हिन्दी – योरोपीय
काल: ६००० ईसा पूर्व

दोपहर का समय है, आज कितने ही दिनों के बाद सूर्य का दर्शन हुआ।

यद्यपि इस पाँच घंटे के दिन में उसके तेज में तीक्ष्णता नहीं है, तो भी बादल, बर्फ, कुहरे और झंझा से रहित इस समय चारों ओर फैलती सूर्य की किरणें देखने में मनोहर और स्पर्श से मन में आनन्द का संचार करती हैं। चारों ओर का दृश्य ? सघन नील-नभ के नीचे पृथ्वी कर्पूर-सी श्वेत हिम से आच्छादित है। चौबीस घंटे से हिमपात न होने के कारण, दानेदार होते हुए भी हिम कठोर हो गया है। यह हिमवसना धरती दिगन्त-व्याप्त नहीं है, बल्कि यह उत्तर से दक्षिण की ओर कुछ मील लम्बी रुपहली टेढ़ी-मेढ़ी रेखा की भाँति चली गई है, जिसके दोनों किनारों की पहाड़ियों पर काली वनपंक्ति है। आइये, इस वनपंक्ति को कुछ समीप से देखें। उसमें दो तरह के वृक्ष ही अधिक हैं-एक श्वेत-बल्कलधारी, किन्तु आजकल निष्पत्र भुर्ज (भोजपत्रे; और दूसरे अत्यन्त सरल उत्तर, समकोण पर शाखाओं को फैलाये अतिहरित या कृष्ण-रहित सुई-से पत्तो वाले देवदारु | वृक्षों का कितना ही भाग हिम से ढँका हुआ है, उनकी शाखाओं और स्कन्धों पर जहाँ-तहाँ रुकी हुई बर्फ उन्हें कृष्ण-श्वेत बना  आँखों को अपनी ओर खींचती है।

 और ? भयावनी नीरवता का चारों ओर अखंड राज्य है। कहीं सेन झिल्ली की झंकार आती है, न पक्षियों का कलरव, न किसी पशु का ही शब्द।

आओ, पहाड़ी के सर्वोच्च स्थान के देवदारु पर चढ़कर चारों ओर देखें | शायद वहाँ बर्फ, धरती, देवदारु के अतिरिक्त भी कुछ दिखाई पड़े । क्या यहाँ बड़े-बड़े वृक्ष ही उगते हैं ? क्या इस भूमि में छोटे पौधों, घासों के लिए स्थान नहीं है ? लेकिन इसके बारे में हम कोई राय नहीं दे सकते | हम जाड़े के दो भागों को पारकर अन्तिम भाग में हैं | जिस बर्फ में ये वृक्ष गड़े हुए-से हैं, वह कितनी मोटी है, इसे नापने का हमारे पास कोई साधन नहीं है। हो सकता है, वह आठ हाथ या उससे भी अधिक मोटी हो। अबकी साल बर्फ ज्यादा पड़ रही है, यह शिकायत सभी को है।

देवदारु के ऊपर से क्‍या दिखलाई पड़ता है ? वही बर्फ, वही वनपंक्ति, वही ऊँची-नीची पहाड़ी भूमि। हाँ, पहाड़ी की दूसरी ओर एक जगह धुआँ उठ रहा है। इस प्राणी-शब्द-शून्य अरण्यानी में धूम का उठना कौतूहल-जनक है। चलो, वहाँ चलकर अपने कौतूहल को मिटायें |

धुआँ बहुत दूर था, किन्तु स्वच्छ निरभ्र आकाश में वह हमें बहुत समीप मालूम होता था। चलकर अब हम उसके नजदीक पहुँच गये हैं। हमारी नाक में आग में पड़ी हुई चर्बी तथा मांस की गन्ध आ रही है। और अब तो शब्द भी सुनाई दे रहे हैं-ये छोटे बच्चों के शब्द हैं। हमें चुपचाप पैरों तथा साँस की भी आहट न देकर चलना होगा, नहीं तो वे जान जायेंगे, और फिर न जाने किस तरह का स्वागत वे खुद या उनके कुत्ते करेंगे।

हाँ, सचमुच ही छोटे-छोटे बच्चे हैं, इनमें सबसे बड़ा आठ साल से अधिक का नहीं है, और छोटा तो एक वर्ष का है। आधे दर्जन लड़के और एक घर में । घर नहीं यह स्वाभाविक पर्वत-गुहा है, जिसके पार्श्व और पिछले भाग अन्धकार में कहाँ तक चले गये हैं, इसे हम नहीं देख रहे हैं, और न देखने की कोशिश करनी चाहिए ! और सयाने आदमी ? एक बुढ़िया जिसके सन जैसे धूमिल श्वेत केश उलझे तथा जटाओं के रूप में इस तरह बिखरे हुए हैं कि उसका मुँह उनमें ढँका हुआ है। अभी बुढ़िया ने हाथ से अपने केश को हटाया। उसकी भौहें भी सफेद हैं, श्वेत चेहरे पर झुर्रियां पड़ी हुई हैं, जो जान पड़ती हैं सभी मुँह के भीतर से निकल रही हैं| गुहा के भीतर आग का धुआँ और गर्मी भी है, खासकर जहाँ बच्चे और हमारी दादी हैं। दादी के शरीर पर कोई वस्त्र नहीं, कोई आवरण नहीं। उसके दोनों सूखे-से हाथ पैरों के पास धरती पर पड़े हुए हैं। उसकी आँखें भीतर घुसी हैं, और हलके नीले रंग की पुतलियाँ निस्तेज शून्य-सी हैं, किन्तु बीच-बीच में उनमें तेज उछल जाता है जिससे जान पड़ता है है कि उनकी ज्योति बिलकुल चली नहीं गई है। कान तो बिलकुल चौकनन्‍ने मालूम होते हैं। दादी लड़कों की आवाज को अच्छी तरह सुन रही जान पड़ती है। अभी एक बच्चा चिल्लाया, उसकी आँख इधर घूमी। बरस-डेढ़-बरस के दो बच्चे हैं, जिनमें एक लड़का और एक लड़की, कद दोनों के बराबर हैं। दोनों के केश जरा-सा पीलापन लिए सफेद हैं, बुढ़िया की भाँति; किन्तु ज्यादा चमकीले, ज्यादा सजीव | उनका शरीर पीवर पुष्ट, अरुण गौर, उनकी आँखें विशाल, पुतलियाँ घनी नीली। लड़का चिल्ला-रो रहा है, लड़की खड़ी एक छोटी हड्डी को मुँह में डाले चूस रही है। दादी ने बुढ़ापे के कम्पित स्वर में कहा- ‘‘आगिन ! आ। यहां आ आगिन ! दादी यहाँ |”  

अगिन उठ नहीं रहा था। उस समय एक आठ बरस के लड़के ने आकर उसे गोद में ले दादी के पास पहुँचाया। इस लड़के के केश भी छोटे बच्चे के से ही पांडु-श्वेत हैं, किन्तु वे अधिक लम्बे हैं, उनमें अधिक लटें पड़ी हुई हैं। उसके आपाद-नग्न शरीर का वर्ण भी वैसा ही गौर है, किन्तु वह उतना पीवर नहीं है; और उसमें जगह-जगह काली मैल लिपटी हुई है। बड़े लड़के ने छोटे बच्चे को दादी के पास खड़ा कर कहा-

“दादी ! रोचना ने हड्डी छीनी। अगिन रोता।”

लड़का चला गया। दादी ने अपने सूखे हाथों से अगिन को उठाया। वह अब भी रो रहा था उसके आँसुओं की बहती धारा ने उसके मैले कंपोलों पर मोटी अरुण रेखा खींच दी थी। दादी ने अगिन के मुँह को चूम-पुचकार कर कहा-“अगिन ! मत रो। रोचना को मारती हूँ”-और एक हाथ को नंगी, किन्तु वर्षों के चर्बी से सिक्‍त फर्श पर पटका। अगिन का “ऊँ-ऊँ” अब भी बन्द न था; और न बेन्द थे आँसू। दादी ने अपनी मैली हथेली से आँसुओं को पोंछते हुए अगिन के कपोलों की अरुण पंक्ति को काला बना दिया। फिर रोते अगिन को बहलाने के लिए सूखे चमड़े के भीतर झलकती हुई ठठरियों के बीच कुम्हड़े की सूखी बंतिया की भौति लटकते चर्ममय स्तनों को लगा दिया। अगिन ने स्तन को मुँह में डाला, उसने रोना बन्द कर दिया। उसी समय बाहर से बातचीत की आवाज आने लगी। उसने शुष्क स्तन से मुँह खींचकर ऊपर झौँका। किसी की मीठी सुरीली आवाज आई-

“अगि—ि-िन”

अगिन फिर रो उठा। दो जनियों (स्त्रियों) ने सिर पर लादे लकड़ी के गट्ठर को एक कोने में पटका। फिर एक रोचना के पास और दूसरी अगिन के पास भाग गईं। अगिन ने और रोते हुए “माँ -माँ” कहा। माँ ने दाहिने हाथ को स्वतंत्र रखते हुए दाहिने स्तन के ऊपर साही के काँटे-से गुँथे सफेद बैल के सरोम चमड़े को खोलकर नीचे रखा। जाड़े की भोजन-कृच्छ्रता के कारण उसके तरुण शरीर पर मांस कम रह गया था, तो भी उसमें असाधारण सौन्दर्य था। उसके लाल मैल-छुटे कपोल की अरुण-श्वेत छविं, ललाट को बचाते बिखरे हुए लट-विहीन पांडु-श्वेत केश, अल्प-मांसल पृथुल वक्ष पर गोल-गोल श्यामल-मुख स्तन, अनुदर कृश-कटि, पुष्ट मध्यम परिमाण नितम्ब, पेशीपूर्ण बर्तुल जंघा, श्रमधावन-परिचित हलाकार पेंडुली। उस अष्टादशी तरुणी ने अगिन को दोनों हाथों में उठाकर उसके मुख, आँख और कपोल को चूमा। अगिन रोना भूल चुका था। उसके लाल होठों में से निकल कर सफेद दुँतुलियाँ चमक रही थीं, उसकी आँखें अर्धमुद्रित थीं, गालों में छोटे-छोटे गड्ढे पड़े हुए थे। नीचे गिरे वृषभ-चर्म पर तरुणी बैठ गई और उसने अगिन के मुँह में अपने कोमल स्तनों को दे दिया। अगिन अपने दोनों हाथों से पकड़े स्तन को पीने लगा। इसी समय दूसरी नग्न तरुणी भी रोचना को लिए पास आकर बैठ गई। उनके चेहरे को देखने से ही पता लग जाता था कि दोनों बहनें हैं।

गुहा में उन्हें निभृत बातचीत करते छोड़ हम बाहर आ देखते हैं।

बर्फ पर चमड़े से ढँके बहुत से पैर एक दिशा की ओर जा रहे हैं। चलो उन पकड़े हुए जल्दी-जल्दी चलें। अभी वह पद-पंक्ति तिरछी हो पार वाली पहाड़ी के जंगल में पहुँची। हम तेजी से दौड़ते हुए बढ़ते जा रहे हैं, किन्तु ताजी पद-पंक्ति खतम होने को नहीं आ रही है। हम कभी श्वेत हिमक्षेत्र में चलते हैं, कभी जंगलों में ही पहाड़ी की रीढ़ को पार कर दूसरे हिमक्षेत्र, दूसरे पार्वत्य वन को लाँघते हुए बढ़ते हैं। आखिर नीचे की ओर से एक वृक्षहीन पहाड़ी की रीढ़ पर हमारी नजर पड़ी। वहाँ नीचे से उठती श्वेत हिमराशि नील नभ से मिल रही है, और उस नील नभ में अपने को अंकित करती हुई कितनी ही मानव-मूर्तियाँ पर्वत-पृष्ठ की आड़ में लुप्त हो रही हैं। उनके पीछे नीला आकाश न होता तो निश्चय ही हम उन्हें न देख पाते। उनके शरीर पर हिम जैसा श्वेत वृष-चर्म है। उनके हाथों में हथियार भी सफेद रंग से रँगे मालूम होते हैं। फिर महान्‌ श्वेत हिमक्षेत्र में उनकी हिलती-डुलती मूर्तियों को भी कैसे पहचाना जा सकता है ?

और पास चलकर देखें। सबसे आगे सुपुष्ट शरीर की एक स्त्री है। आयु चालीस और पचास के बीच होगी। उसकी खुली दाहिनी भुजा को देखने से ही पता लगता है कि वह बहुत बलिष्ठ स्त्री है। उसके केश चेहरे, अंग-प्रत्यंग गुहा की पूर्वोक्‍त दोनों तरुणियों के समान, किन्तु बड़े आकार के हैं। उसके बायें हाथ में तीन हाथ लम्बी भुर्ज की मोटी नोकदार लकड़ी है। दाहिने में चमड़े की रस्सी से लकड़ी के बेंत में बँधा घिसकर तेज किया हुआ पाषाण-परशु है। उसके पीछे-पीछे चार मर्द और दो स्त्रियाँ चल रही है| एक मर्द की आयु स्त्री से कुछ अधिक होगी, शेष छब्बीस से चौदह वर्ष के हैं। बड़े मर्द के केश भी वैसे ही बड़े-बड़े तथा पांडु-श्वेत हैं। उसका मुँह उसी रंग की घनी दाढ़ी-मूँछ से ढँका हुआ है। उसका शरीर भी स्त्री की भाँति ही बलिष्ठ है; उसके हाथों में भी वैसे ही दो हथियार हैं। बाकी तीन मर्दों में दो उसी तरह की घनी दाढ़ी-मूछों वाले, किन्तु उम्र में कम हैं। स्त्रियों में एक बाईस, दूसरी सोलह से कम है | हम गुहा के चेहरों को देख चुके हैं और दादी को भी, सबको मिलाने से साफ मालूम होता है कि इन सभी स्त्री-पुरुषों का रूप दादी के साँचे में ढला हुआ है|

इन नर-नारियों के हाथ के लकड़ी, हड्डी और पत्थर के हथियारों और उनकी गम्भीर चेष्टा से पता लग रहा है कि वे किसी मुहिम पर जा रहे हैं।

पहाड़ी से नीचे उतर कर अगुवा स्त्री-माँ कहिए-बाईं ओर घूमी; सभी चुपचाप उसके पीछे चल रहे हैं। बर्फ पर चलते वक्‍त चमड़े से उनके ढँके पैरों से जरा भी शब्द नहीं निकल रहा है। अब आगे की ओर लटकी हुई (प्राग्‌ भार, पहाड़) बड़ी चट्टान है, जिसकी बगल में कई चट्टाने पड़ी हुई हैं। शिकारियों ने अपनी गति अत्यन्त मन्द कर दी है। वे तितर-बितर होकर बहुत सजग हो गये हैं। वे सारे पैरों को चीरकार बहुत देर करके एक पैर के पीछे दूसरे पैर को उठाते, चट्टानों को हाथ से स्पर्श करते आगे बढ़ रहे हैं। माँ सबसे पहले गुहा के द्वार-खुलाव-पर पहुँची। वह बाहर की सफेद बर्फ को ध्यान से देखती है, वहाँ किसी प्रकार का पद चिह्न नहीं है। फिर वह अकेले गुहा में घुसती है। कुछ ही हाथ बढ़ने पर गुहा घूम जाती है, वहाँ रोशनी कुछ कम है। थोड़ी देर ठहर कर वह अपनी आँखों को अभ्यस्त बनाती है, फिर आगे बढ़ती है। वहाँ देखती है तीन भूरे भालू्-मां, बाप, बच्‍चा-मुँह नीचे किए धरती पर सोये, या मरे पड़े हैं-उनमें जीवन का कोई चिह्न नहीं दीख पड़ता।

माँ धीरे से लौट आई। परिवार उसके खिले चेहरे को ही देखकर भाव समझ गया। माँ अँगूठे से कानी अंगुली को दबाकर तीन अँगुलियों को फैलाकर दिखाती है। माँ के बाद दो मर्द हथियारों को सँभाले आगे बढ़ते हैं, दूसरे साँस रोके वहीं खड़े प्रतीक्षा करते हैं। भीतर जाकर माँ भालू के पास जाकर खड़ी होती है। बड़ा पुरुष भालुनी के पास और दूसरा बच्चे के पास | फिर वे अपने नोकदार डंडे को एक साथ ऐसे जोर से मारते हैं, कि वह कोख में घुसकर कलेजे में पहुँच जाता है। कोई हिलता-डोलता नहीं । जाड़े की छः-मासी निद्रा के टूटने में अभी महीने से अधिक की देर है, किन्तु माँ और परिवार को इसका क्या पता ? उन्हें तो सतर्क रहकर ही काम करना होगा। डंडे की नोक को तीन-चार बार और पेट में घुसा वे भालू को उलट देते हैं, फिर निर्भय हो उनके अगले पैरों और मुँह को पकड़कर घसीटते हुए उन्हें बाहर लाते हैं। सभी खुश हो हँसते और जोर-जोर से बोलते हैं।

बड़े भालू को चित उलटकर माँ ने अपने चमड़े की चादर से एक चकमक पत्थर का चाकू निकाला, फिर घाव की जगह से मिलाकर पेट के चमड़े को चीर दिया-पत्थर के चाकू से इतनी सफाई के साथ चमड़े का चीरना अभ्यस्त और मजबूत हाथों का ही काम है। उसने नरम कलेजी का एक टुकड़ा काटकर अपने मुँह में डाला, दूसरा सबसे छोटे चौंदह वर्ष के लड़के के मुँह में। बाकी सभी लोग भालू के गिर्द बैठ गये, माँ सबको कलेजी का टुकड़ा काटकर देती जा रही थी। एक भालू के बाद जब माँ ने दूसरे भालू पर हाथ लगाया, उस वक्‍त षोडशी तरुणी बाहर गई | उसने बर्फ का एक डला मुँह में डाला, उसी वक्‍त बड़ा पुरुष भी बाहर आ गया। उसने भी एक डले को मुँह में डाल षोडशी के हाथ को पकड़ लिया। वह जरा झिझक कर शान्त हो गई। पुरुष उसे अपनी भुजा में बाँध एक ओर ले गया।

षोडशी और पुरुष हाथ में बर्फ का बड़ा डला लिये जब भालू के पास लौटे, तब दोनों के गालों और आँखों में ज्यादा लाली थी। पुरुष ने कहा-

“मै काटता हूँ, माँ ! तू थक गई है।”

माँ ने चाकू को पुरुष के हाथ में दे दिया। उसने झुककर चौबीस वर्ष के तरुण के मुँह को चूमा, फिर उसका हाथ पकड़कर बाहर चली गई |

उन्होंने तीन भालुओं की कलेजी को खाया। चार मास के निराहार सोये भालुओं में चर्बी कहाँ से रहेगी, हाँ बच्चे भालू का मांस कुछ अधिक नरम और सुस्वादु था, जिसमें से भी कितना ही उन्होंने खा डाला। फिर थोड़ी देर विश्राम करने के लिए सभी पास-पास लेट गये।

अब उन्हें घर लौटना था। नर-मादा भालुओं को दो-दो आदमियों ने चमड़े की रस्सी से चारों पैरों को बाँध डंडे के सहारे कन्धे पर उठाया और छोटे भालू को एक तरुणी ने। माँ अपना पाषाण-परशु सँभाले आगे-आगे चल रही थी।

उन जांगल मानवों को दिन के घड़ी-घंटे का पता तो था नहीं, किन्तु वे यह जानते थे कि आज चाँदनी रात रहेगी। थोड़ा ही चलने के बाद सूर्य क्षितिज के नीचे चला गया जान पड़ता था, किन्तु वह गहराई में नहीं गया, इसीलिए सन्ध्या-राग घण्टों बना रहा, और जब वह मिटा तब धरती, अम्बर सर्वत्र श्वेतिमा का राज हो गया।

अभी घर-गुहा दूर थी, जबकि खुली जगह में एक जगह माँ एकाएक खड़ी हो कान लगाकर कुछ सुनने लगी। सब लोग चुपचाप खड़े हो गये। षोडशी ने छब्बीसे तरुण के पास जाकर कहा– “गुर्र, गुर्र, वृक, वृक (भेड़िया)”। माँ ने भी ऊपर-नीचे सिर हिलाते हुए कहा… “गुर्र, गुर्र, वृक। बहुत वृक, बहुत वृक |” फिर उत्तेजनापूर्ण स्वर में कहा-“तैयार |”

इस बीच में देखें और कितनों को देना होता है। तीन भालू और एक भेड़िया में तो उनका जाड़ा नहीं कट सकता।

बच्चे बड़े खुश थे, बेचारे खाली पेट लेटे हुए थे। माँ ने पहले उन्हें भेडिये की कलेजी काट-काट कर दी। लंड़के हप्‌-हप्‌ कर खा रहे थे। चमड़े को बिना नुकसान पहुँचाए उतारा। चमड़े का बड़ा काम है। मांस काटकर जब दिया जाने लगा, बहुत भूखों ने तो कुछ कच्चा ही खाया, फिर सबने ओग के अंगार पर भून-भून कर खाना शुरू किया। अपने भुने टुकड़ों में से एक गाल काटने के लिए माँ की सभी खुशमंद कर रहे थे। माँ ने कहा- “बस आज पेट भर खाओ, कल से इतना नहीं मिलेगा।”

 माँ उठकर गुहा के एक कोने में गई, वहाँ से चमड़े की फूली हुई झिल्ली को लाकर कहा-“बस यही मधु-सुरा है, आज पियो, नाचो, क्रीड़ा करो |”

छोटों को झिल्ली से घूँट-घूँट करके पीने को मिला, बड़ो को ज्यादा-ज्यादा। नंशा चढ़ आया। आँखें लाल हो आईं। फिर हँसी का ठहाका शुरू हुआ। किसी ने गाना गाया। बड़े पुरुष ने लकड़ी से लकड़ी बजानी शुरू की। लोग नाचने लगे। आज वस्तुतः आनन्द की रात थी। माँ का राज्य था, किन्तु वह अन्याय और असमानता का राज्य नहीं था। बूढ़ी दादी और बड़े पुरुष को छोड़ बाकी सभी माँ की सन्‍तानें थीं, और बूढ़ी ही बड़ा पुरुष तथा माँ बेटा-बेटी थे, इसलिए वहाँ मेरा-तेरा का प्रश्न नहीं हो सकता था। वस्तुतः मेरा-तेरा का युग आने में अभी देर थी। किन्तु हाँ, माँ को सभी पुरुषों पर समान और प्रथम अधिकार था। अपने चौबीसे पुत्र और पति के चले जाने से उसे अफसोस न हुआ हो, यह बात नहीं; किन्तु उस समय का जीवन अतीत से अधिक वर्तमान-विद्यमान की फिक्र करता था। माँ के दो पति मौजूद थे, तीसरा चौदह साला तैयार हो रहा था। उसके राज्य के रहते-रहते बच्चों में से भी न जाने कितने पति की अवस्था तक पहुँच सकते थे। माँ छब्बीसे को पसन्द करती थी, इसलिए बाकी तीन तरुणियों के लिए एक वह पचासा पुरुष ही बचा था।

जाड़ा बीतते-बीतते दादी एक दिन सदा के लिए सोई पड़ी मिली ! बच्चों में से तीन को भेड़िये ले गये और बड़ा पुरुष बर्फ पिघलने पर उमड़ी नदी के प्रवाह में चला गया। इस प्रकार परिवार सोलह की जगह नौ का रह गया।

बसन्त के दिन थे। चिरमृत प्रकृति में नवजीवन का संचार हो रहा था।

छः महीने से सूखे भुर्ज-वृक्षों पर ठूसे-पत्ते निकल रहे थे। बर्फ पिघली, धरती हरियाली से ढँकती जा रही थी। हवा में वनस्पति और नई मिट्टी की भींगी-भींगी मादक गन्ध फैल रही थी। जीवन-हीन दिगन्त सजीव हो रहा था। कहीं वृक्षों पर पक्षी नाना-भाति के मधुर शब्द सुना रहे थे, कहीं झिल्ली अनवरत शोर मचा रही थी, कहीं हिम-द्रवित प्रवाहों के किनारे बैठे हजारों जल-पक्षी कृमि-भक्षण में लगे हुए थे, कहीं कलहंस प्रणय-क्रीड़ा कर रहे थे। अब इन हरे पार्वत्य वनों में कहीं झुंड के झुंड हिरन कूदते हुए चरते दिखलाई पड़ते थे, कहीं भेड़ें, कहीं बकरियाँ, कहीं बारहसिंगे, कही गायें। और कहीं इनकी घात में लगे हुए चीते दुबक कर बैठे हुए थे, और कहीं भेड़िये।

 जाड़े के लिए अवरुद्ध नदी के प्रवाह की भाँति एक जगह रुक गए मानव-परिवार भी अब प्रवाहित होने लगे थे-अपने हथियारों, अपने चमड़ों तथा अपने बच्चों को लादे गृह-अग्नि को सँभाले अब वे खुली जगहों में जा रहे थे। दिन बीतने के साथ पशु-वनस्पतियों की भाँति उनके भी शुष्क चर्म के नीचे मांस और चर्बी के मोटे स्तर जमते जा रहे थे। कभी उनके लम्बे केश वाले बड़े-बड़े कुत्ते भेड़ या बकरी पकड़ते, कभी वे स्वयं जाल, बाण या लकड़ी के भाले से किसी जन्तु को मारते। नदियों में भी मछलियाँ थीं, और इस वोल्गा के ऊपरी भाग के निवासियों के जाल आज-कल कभी खाली बाहर नहीं आते थे |

रात में अब भी सर्दी थी, किन्तु दिन गर्म था, और निशा-परिवार (माँ का नाम निशा) आजकल कई दूसरे परिवारों के साथ वोल्गा के तट पर पड़ा हुआ था। निशा की भाँति ही दूसरे परिवारों पर भी उनकी माताओं का शासन था, पिता का नहीं। वस्तुतः वहाँ किसका पिता कौन है, यह बतलाना असम्भव था। निशा को आठ पुत्रियाँ और छः पुत्र पैदा हुए, जिसमें चार लड़कियाँ और तीन पुत्र अब भी उसकी पचपन वर्ष की अवस्था में मौजूद हैं। इनके निशा-सन्तान होने में सन्देह नहीं, क्योंकि इसके लिए प्रसव का साक्ष्य मौजूद है; किन्तु उनका बाप कौन है, इसे बताना सम्भव नहीं है। निशा के पहले जब उसकी माँ-बूढ़ी दादी-का राज्य था, तब बूढ़ी दादी-उस वक्‍त प्रौढ़ा-के कितने ही भाई पति, कितने ही पुत्र पति थे, जिन्होंने कितनी ही बार निशा के साथ नाचकर, गाकर उसके प्रेम का पात्र बनने में सफलता पाई थी, फिर स्वयं रानी बन जाने पर निशा की निरन्तर बदलती प्रेमाकांक्षा को उसके भाई या सयाने पुत्र ठुकराने की हिम्मत नहीं रखते थे। इसीलिए निशा की जीवित सातों संतानों में किसका कौन बाप है, यह कहना असम्भव है। निशा के परिवार में आज वही सबसे बड़ी बूढ़ी-और प्रभुता-शालिनी भी है; यद्यपि यह प्रभुता देर तक रहने वाली नहीं है। वर्ष-दो वर्ष में वह स्वयं बूढ़ी दादी बनने वाली है, और तब बलिष्ठ निशा-पुत्री लेखा का राज्य होने वाला है। उस वक्‍त लेखा की बहनों का उससे झगड़ा जरूर होगा। जहाँ हर साल परिवार के कुछ आदमियों को भेड़िये या चीते के जबड़ों, भालू के पंजों, बैल के सींगों, वोल्गा की बाढ़ों की भेंट चढ़ना है, वहा परिवार को क्षीण होने से बचाना हर रानी माता का कर्त्तव्य है। तो भी ऐसा होता आया है, लेखा की बहनों में से एक या दो अवश्य स्वतन्त्र परिवार कायम करने में समर्थ होंगी। यह परिवार-वृद्धि तभी रुकती, यदि अनेक वीर्य के एक क्षेत्र होने की भांति अनेक रज का भी एक वीर्य-क्षेत्र होता |

परिवार की स्वामिनी निशा अपनी पुत्री लेखा को शिकार में बहुत सफल देखती है। वह पहाड़ियों पर हरिनों की भाँति चढ़ जाती है। उस दिन एक चट्टान पर, बहुत ऊँचे ऐसी जगह एक बड़ा मधुछत्र दिखाई पड़ा, जहाँ रीछ (मध्वद) भी उसे खा नहीं सकता था। लेकिन, लेखा ने लट्ठे पर लट्ठे बाँधे, फिर छिपकली की भाँति सरकते रात को उसने मशाल से छत्ते को विषैली बड़ी-बड़ी मधु-मक्खियों को जलाकर उसमें छेद कर दिया। नीचे के चमड़े के कुप्पे में तीस सेर से कम मधु नहीं गिरा होगा। लेखा के इस साहस की तारीफ सारा निशा-परिवार ही नहीं, पड़ोसी-परिवार भी कर रहा था। किन्तु निशा उससे सन्तुष्ट नहीं थी। वह देख रही थी, तरुण निशा-पुत्र जितना लेखा के इशारे पर नाचने के लिए तैयार है, उतना उसकी प्रार्थना को सुनना नहीं चाहते, यद्यपि वे अभी निशा की खुल्लम-खुल्ला अवज्ञा करने का साहस नहीं रखते |

निशा कितने ही दिनों से कोई रास्ता सोच रहीं थी। कभी उसे ख्याल होता लेखा को सोते में गला दबा कर मार दें, किन्तु वह यह भी जानती थी कि लेखा उससे अधिक बलिष्ठ है; वह अकेली उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती। यदि वह दूसरे की सहायता लेना चाहे, तो क्‍यों कोई उसकी सहायता करेगा ? परिवार के सभी पुरुष लेखा के प्रणय-पात्र, कृपा-पात्र बनना चाहते थे। निशा की पुत्रियाँ भी माँ का हाथ बँटाने के लिए तैयार न थीं, वे लेखा से डरती थीं | वे जानती थीं कि असफल होने पर लेखा बुरी तरह से उनके प्राण लेगी।

निशा एकान्त में बैठी कुछ सोच रही थी। एकाएक उसका चेहरा खिल उठा-उसे लेखा का परास्त करने की कोई युक्‍त‍ि सूझ पड़ी।

 पहर भर दिन चढ़ आया था। सारे परिवार अपने-अपने चमड़े के तम्बुओं के पीछे नंगे लेटे या बैठे धूप ले रहे थे, किन्तु निशा तम्बू के सामने बैठी थी, उसके पास लेखा का तीन वर्ष का पुत्र खेल रहा था। निशा के हाथ में दोने में लाल-लाल स्ट्राबेरी के फल थे। वोल्गा की धारा पास से बह रही थी, और निशा के सामने सीधे खड़े अरार तक ढालू जमीन थी। निशा ने एक फल लुढ़काया, लड़का दौड़ा और उसे पकड़कर खा गया। फिर दूसरे को लुढ़काया; उसे थोड़ा और आगे जाने पर वह पकड़ सका। निशा ने जल्दी-जल्दी कितने ही फल लुढ़का दिये; बच्चे ने उन्हें पकड़ने के लिए इतनी जल्दी की कि एक बार उसका पैर अरार से फिसल गया और वह धम से वोल्गा की तेज धार में जा गिरा। निशा वोल्गा की ओर नजर दौड़ाए चीख उठी। कुछ दूर पर बैठी लेखा ने देखा। पुत्र को न देख वह धार की ओर झपटी। उसका पुत्र धार में अभी नीचे-ऊपर हो रहा था। उसने छलाँग मारी और पुत्र को पकड़ लेने में सफल हो गई। बहुत पानी पी जाने से बच्चा शिथिल हो गया था। वोल्गा का बर्फीला जल शरीर में कॉँटे की तरह चुभ रहा थां। लेखा को धार काटकर किनारे की ओर बढ़ना मुश्किल था। उसके एक हाथ में बच्चा था, दूसरे हाथ और पैरों से वह तैरने की कोशिश कर रही थी। उसी वक्‍त अपने गले को उसने किसी के मजबूत हाथों में फँसा देखा। लेखा को अब समझने में देर न लगी। वह देर से निशा की बदली हुई मनोवृत्ति को देख रही थी। आज निशा अपने राह के इस कॉटे-लेखा-को निकालना चाहती है। लेखा अब भी निशा को अपना बल दिखला सकती थी; किन्तु उसके हाथ में बच्चा था। निशा ने लेखा को जोर लगाते देख अपनी छाती को उसके सिर पर रख दिया। लेखा एक बार डूब गई। छटपटाने में उसका बच्चा हाथ से, छूट गया। अब भी निशा ने उसे बेकाबू कर रखा था। एकाएक उसका हाथ निशा के गले में पड़ गया। लेखा बेहोश थी और निशा 1 साथ तैरने में असमर्थ। उसने कुछ कोशिश की, किन्तु बेकार ! दोनों एक साथ वोल्गा की भेंट हुई।

परिवार की बलिष्ठ स्त्री रोचना निशा-परिवार की स्वामिनी बनी।१

१, आज से ३६१ पीढ़ी पहले की कथा है। उस वक्‍त हिन्द, ईरान और जातियाँ एक कबीले के रूप में थी। मानवता का आरम्भिक काल था।

पुस्तक का अनुक्रम देखेंं

यह पुस्तक ड्री्म्ज़़ डिजीटल मीडिया द्वारा ड्रीम्ज़ पब्लिकेशन्स के सहयोग से डिजीटाईज़ की गई है।


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एक नज़र ईधर भी

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